कुछ हल्का फुल्का व्यंग
सरकारी सिस्टम में बैठे कुछ साहब लोगों को भ्रष्टाचार की बीमारी ऐसी लगी है कि यह अब उनकी नसों में खून की जगह बह रही है। यह बीमारी इतनी पुरानी हो चुकी है कि इसे देखकर डाक्टर भी कहते हैं क्लासिक केस ऑफ क्रॉनिक करप्शन!”साहब लोग इस बीमारी को बड़ी शान से ढोते हैं, जैसे किसी को पुरानी वंश परंपरा का गहना मिला हो। अफसरशाही के गलियारों में यह बीमारी इतनी सामान्य है कि अगर किसी को यह ना हो तो उसे शक की नजर से देखा जाता है।
सिस्टम में बैठे ये महारथी सिर्फ एक चीज़ पर यकीन रखते हैं कागज को कैश की खुशबू चाहिए।’ बिना खुशबू के फाइलें वैसे ही पड़ी रहती हैं जैसे किसी पुराने सरकारी गोदाम में धूल खाई बोरियां। फाइलें चलाने का असली गियर है चाय की चुस्की और नीचे से गुजरी मिठास भरी पर्ची।
एक दिन मैं अपनी ईमानदार फाइल लेकर गया। सोचा, सिस्टम बदल चुका होगा, अब सब ऑनलाइन है, पारदर्शिता का जमाना है। लेकिन सामने बैठे साहब की मुस्कान ने ही सारा गणित समझा दिया। उन्होंने कहा “बैठिए, चाय लीजिए, काम हो जाएगा।” मैं समझ गया ये सिर्फ चाय नहीं है, यह एक ‘कोड वर्ड’ है। चाय की प्याली में डूबा हुआ सिस्टम अपनी पुरानी आदतें नहीं छोड़ता। मेरी फाइल साहब की मेज पर पड़ी थी। उस पर इतने पुराने निशान थे कि लगता था, यह फाइल नहीं बल्कि कोई पुरातत्व की चीज है। मैंने पूछा “साहब, ये फाइल कब तक निकलेगी?” साहब ने चश्मा ठीक किया और बोले “देखिए, काम तो हो जाएगा, लेकिन प्रोसेस है। प्रोसेस में टाइम लगता है।” ‘प्रोसेस’ ये शब्द सुनते ही मुझे समझ आया कि यह प्रोसेस नहीं, यह पैसे का प्रोसेस है।
तभी दफ्तर का चपरासी अंदर आया और कान में फुसफुसाया “साहब, मीटिंग में जाना है। ये फाइल को जल्दी निपटा देते हैं... अगर आप चाय-वाय का इंतजाम कर दें।” मैं मुस्कुराया और कहा “हम ठहरे ठेठ, चाय नहीं कलम की स्याही से काम करने वाले।”
उस दिन दफ्तर से लौटते समय मन में एक विचार आया “जब साहब लोग भ्रष्टाचार की बीमारी से इतने ग्रसित हैं तो क्यों न इनको इसका टीका लगाया जाए?” वैसे भी सरकार टीकों की बड़ी मुहिम चलाती रही है पोलियो, कोरोना, डेंगू। तो क्यों न एक टीका ‘करप्शन म्यूटेशन डोज़’ भी बनाया जाए? लेकिन यह मेडिकल वाला टीका नहीं होगा। यह होगा खबरों का टीका सच की सुई और व्यंग्य का इंजेक्शन।
मैंने अपनी पैनी कलम उठाई और एक खबर लिखी। खबर थी सटीक, सच्ची और सीधी “साहब की टेबल पर टीवी चैनलों की विज्ञापन फाइलों का कब्रिस्तान,औऱ चाय की प्यालियों में तैरती उम्मीदें।” खबर छपते ही सिस्टम में हलचल मच गई। साहब लोग तिलमिला गए, बोले देखो इसने फिर हमारे विभाग के बारे में उल्टा सीधा लिखा है ? इस बोलो थोड़ा संभल कर लिखा करें। विभाग और हमारी इमेज खराब हो रही है।? तो आपको बतादूँ साहब, ये खबर नहीं, टीका है। बीमारी जड़ से खत्म करने के लिए डोज़ जरूरी है।”
भ्रष्टाचार ऐसा वायरस है जो किसी भी सिस्टम में म्यूटेट कर जाता है। नई सरकार आए, नई नीतियां आएं, लेकिन वायरस अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है। कभी यह ठेके में आता है, कभी तबादले में, कभी फाइलों में, तो कभी चाय की प्यालियों में। और सबसे मजेदार बात यह वायरस कभी खत्म नहीं होता, बस चेहरे बदलते रहते हैं।
पहले टीके से थोड़ी हलचल जरूर हुई, लेकिन बीमारी इतनी गहरी है कि अब बूस्टर डोज की जरूरत है।
यह बूस्टर डोज कैसा होगा?
और ज्यादा धारदार खबरें
नाम लेकर जवाबदेही
फाइलों के कब्रिस्तान की तस्वीरें
और उन प्यालियों के रंगीन राज़ जिनमें डूबा सिस्टम तैरता है
यह बूस्टर सिर्फ सिस्टम को नहीं, जनता को भी देगा ताकत ताकत सवाल पूछने की, ताकत जवाब मांगने की।
हाँ, हमारे टीके का भी साइड इफेक्ट है।
कुछ लोग तिलमिलाएंगे
कुछ धमकियाँ देंगे
कुछ कहेंगे इतना सच मत लिखो, सिस्टम नाराज़ हो जाएगा। लेकिन क्या करें? बीमारी पुरानी है, डोज़ भी स्ट्रॉन्ग चाहिए।
पहला टीका लग चुका है। असर दिख रहा है। कुछ साहब लोग बीमार पड़ गए “इमेज का बुखार चढ़ गया है। लेकिन यह लड़ाई खत्म नहीं हुई। अभी बूस्टर डोज बाकी है। और यह डोज पहले से ज्यादा धारदार, ज्यादा असरदार होगा।
क्योंकि हमारी लड़ाई किसी साहब से नहीं, उस वायरस से है जो इस सिस्टम को खोखला कर रहा है।
याद रखिए बीमारी पुरानी है, पर खबरों का टीका असरदार है। और हम कलम से इंजेक्शन लगाते रहेंगे... जब तक सिस्टम से करप्शन का वायरस बाहर न निकल जाए।
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