नेता प्रतिपक्ष -उमंग सिंघार
कटनी। आज कटनी में माइनिंग कॉन्क्लेव का भव्य आयोजन हो रहा है। सरकार कहती है कि यह कार्यक्रम प्रदेश की प्रगति और खनन क्षेत्र के विकास के लिए है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है। इस कॉन्क्लेव के मंच पर चमकते लाइट, आलीशान होटल और उद्योगपतियों की महफ़िल सज रही है, लेकिन सवाल यह है कि यह कॉन्क्लेव किसके लिए है?
क्या यह प्रदेश के बेरोज़गार युवाओं के लिए है?
क्या यह उन छोटे कारोबारियों के लिए है जो सालों से इस धंधे में पसीना बहा रहे हैं? या फिर यह बाहर की कंपनियों और उद्योगपतियों को प्रदेश की धरती लूटने का लाइसेंस देने का उत्सव है? सरकार के पास इन सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं है। लेकिन एक बात साफ है प्रदेश के 1500 से ज्यादा स्थानीय माइनिंग कारोबारी हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। उन्हें लीज़ नहीं मिल रही, उन्हें राहत नहीं मिल रही, जबकि बाहर की कंपनियों को रेड कारपेट बिछाकर बुलाया जा रहा है।
पेसा कानून की धज्जियां, आदिवासी बेघर
खनन का सबसे बड़ा दंश आदिवासी झेल रहे हैं। पेसा कानून के तहत ग्रामसभा की अनुमति के बिना खनन नहीं हो सकता। लेकिन कटनी से लेकर सिंगरौली तक आदिवासी इलाकों में बिना इजाज़त बुलडोज़र चल रहे हैं। लोगों को उनके घरों से बेदखल किया जा रहा है। मुआवज़े का नाम नहीं, पुनर्वास की योजना नहीं। क्या यही विकास है? सिंगरौली के मोरवा इलाके में तो हालात और भी भयावह हैं। यहां 50 हजार से ज्यादा परिवार विस्थापित होने वाले हैं। सरकार ने साफ कह दिया है—“यह इलाका खाली करना होगा।” सवाल यह है कि इन लोगों का क्या होगा? कौन देगा इन्हें छत, रोज़गार, ज़िंदगी?
रेत माफिया का साम्राज्य और सरकार की चुप्पी
प्रदेश में रेत माफिया का तांडव जारी है। नदियों की रेत चोरी हो रही है, जंगल लूटे जा रहे हैं और सरकार सिर्फ तमाशा देख रही है। CAG की 2023 रिपोर्ट कहती है कि प्रदेश में 90% रॉयल्टी चोरी हो रही है। जी हां, 90%!
यह कोई छोटी बात नहीं है। एक चिट्ठी पर 10 ट्रक निकल जाते हैं। फर्जी परमिट से खनन हो रहा है। सवाल है कि यह सब बिना राजनीतिक संरक्षण के कैसे संभव है? क्या यह अवैध कमाई का खुला खेल नहीं है?
डीम्ड परमिशन का गोरखधंधा
अब बात करते हैं डीम्ड परमिशन की। SIYA के तहत 450 डीम्ड परमिशन जारी की गईं। बिना किसी मीटिंग, बिना किसी पर्यावरण मूल्यांकन के। एक-एक कंपनी से 3-4 करोड़ की वसूली हुई। यह कैसा खेल है? क्या यह कानून का मज़ाक नहीं है?
खनन के नाम पर पर्यावरण का कत्लेआम हो रहा है। जंगल उजड़ रहे हैं, पहाड़ खोदे जा रहे हैं, नदियां सूख रही हैं। लेकिन सरकार को सिर्फ उद्योगपतियों की तिजोरी भरने की चिंता है।
जंगलों का कत्लेआम, आदिवासियों की बर्बादी
आंकड़े डराने वाले हैं। पिछले 15 साल में प्रदेश में 40 हजार हेक्टेयर जंगल खनन के नाम पर साफ कर दिया गया। यह सिर्फ पेड़ों की कटाई नहीं है, यह आदिवासियों की जिंदगी उजाड़ने की साज़िश है। जंगल उनके जीवन का आधार हैं। जब जंगल उजड़ते हैं, तो उनके घर, उनकी संस्कृति, सबकुछ खत्म हो जाता है।
कटनी से लेकर सिंगरौली तक, मंडला से बालाघाट तक हर जगह यही कहानी है। बड़े उद्योगपति आते हैं, खदानें खोदी जाती हैं, और जब खदानें खत्म हो जाती हैं तो वहां सिर्फ उजाड़ जमीन बचती है। लोग रोज़गार के नाम पर सड़क पर आ जाते हैं।
DMA फंड का काला सच
अब जरा DMA यानी डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड की बात करें। 10 साल में इस फंड में 13 हजार करोड़ रुपये आए। यह पैसा खनन प्रभावित इलाकों के विकास के लिए था। सड़कें बननी थीं, अस्पताल बनने थे, स्कूल खुलने थे। लेकिन क्या हुआ?
जिन गांवों की जमीन गई, वहां अब भी टूटी सड़कें हैं, स्कूल में टीचर नहीं, अस्पताल में डॉक्टर नहीं। तो सवाल है—13 हजार करोड़ गया कहां? किसकी जेब में गया?
कटनी का कॉन्क्लेव या खनिज उत्सव?
आज कटनी में जिस माइनिंग कॉन्क्लेव का शोर है, वह असल में भाजपा का खनिज उत्सव है। यहां मंच पर नेता और उद्योगपति मुस्कुरा रहे हैं, समझौते हो रहे हैं, बड़ी-बड़ी घोषणाएं हो रही हैं। लेकिन उन लोगों की आवाज कौन सुनेगा जिनके घर उजड़ रहे हैं? उन आदिवासियों का दर्द कौन समझेगा जिन्हें जंगल से बेदखल किया जा रहा है?
सरकार का दावा है कि यह कॉन्क्लेव निवेश लाएगा, रोजगार देगा। लेकिन पिछले 15 साल का रिकॉर्ड बताता है कि ऐसे कॉन्क्लेव से सिर्फ माफिया और पूंजीपति मालामाल होते हैं। प्रदेश की धरती बिकती है, नदियां लुटती हैं, जंगल उजड़ते हैं और आम आदमी कंगाल हो जाता है।
मोहन यादव सरकार से सीधे सवाल
अब सवाल यह है—
✔ क्या मोहन यादव सरकार पेसा कानून का पालन करेगी?
✔ क्या सरकार 1500 स्थानीय माइनिंग कारोबारियों को उनका हक देगी?
✔ क्या सरकार DMA फंड का हिसाब देगी?
✔ क्या सरकार रेत माफिया पर नकेल कसेगी?
✔ या फिर यह प्रदेश सिर्फ पूंजीपतियों और माफियाओं की खान बनकर रह जाएगा?
कटनी में हो रहा यह माइनिंग कॉन्क्लेव असल में भाजपा का खनिज उत्सव है, जिसकी कीमत आदिवासी, किसान, मजदूर और आम जनता चुका रही है।
और आखिर में सवाल जनता से—
क्या आप अपनी जमीन, अपना जंगल, अपना हक ऐसे ही लुटने देंगे?
या आवाज उठाएंगे?
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