Saturday ,30th August 2025

हमें कुत्तों से सीखना होगा ,हक़ के लिए जोर से भौंकना होगा!

 

     व्यंग्य एक गहराई और सच्चाई है
      व्यंगकार - राजेंद्र सिंह जादौन 

न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी बंधी होती है। कहा जाता है, यह उसकी निष्पक्षता का प्रतीक है। पर कभी-कभी लगता है यह पट्टी सिर्फ़ दिखावे की नहीं, बल्कि काम न करने की गारंटी है। इंसानों के मुक़दमे सालों-साल कोर्ट-कचहरी की गलियों में धूल खाते रहते हैं। पीढ़ियाँ बीत जाती हैं, वकील की दाढ़ी काली से सफ़ेद हो जाती है, लेकिन तारीख़ पर तारीख़ मिलती है न्याय नहीं।

पर ज़रा पलटकर देखिए! इंसानों को न्याय देने में जहाँ सिस्टम को आधी सदी लग जाती है, वहीं कुत्तों का केस मात्र 10 दिन में निपटा। हाँ, आपने सही पढ़ा कुत्ते, वो जिन्हें हम गली का, मोहल्ले का, बेकार प्राणी समझते हैं। जिनके लिए इंसान अपने घरों के दरवाज़े बंद कर देता है। वो कुत्ते आज कानून के आइकन बन गए।

कुत्तों ने केस जीता और इंसानों को हारा दिया!
यह सिर्फ़ जीत नहीं, यह हमारी न्याय व्यवस्था पर एक कुत्तानुमा तमाचा है। यह केस हमें बताता है कि हमारे समाज में इंसान से ज़्यादा सम्मानित दर्जा अब पालतू जानवरों का है।

तारीख़ पर तारीख़ बनाम 10 दिन का चमत्कार

किसी गरीब किसान का ज़मीन का केस देख लीजिए। उसके दादा ने केस डाला, बेटा लड़ा, पोता लड़ते-लड़ते मर गया। लेकिन केस अब भी “विचाराधीन” है। वहीं कुत्ते का केस 10 दिन में सुलझ गया। क्यों? क्योंकि कुत्ता न तो घूस देता है, न वकील बदलता है, न ही कोर्ट में माई लॉर्ड के आगे गिड़गिड़ाता है। कुत्ता सीधे सड़क पर जाकर अपना हक़ मांगता है भौंक-भौंक कर। और मज़े की बात यह है कि सिस्टम उसकी आवाज़ सुन भी लेता है। इंसानों को कहा जाता है“अगली तारीख़ ले लो।” कुत्ते को कहा जाता है “सर, आपका आदेश हुआ समझिए।”

सोचिए, अगर इंसान भी केस लड़ने के लिए कुत्ता स्टाइल अपनाए, तो क्या होगा? कोर्ट के गेट पर इंसान लाइन लगाकर भौंकने लगेंगे “भौं भौं न्याय दो!” जज साहब को भी सोचना पड़ेगा “इतने सारे कुत्ते कोर्ट में कैसे घुस आए?” शायद तब जाकर इंसान को भी 10 दिन में न्याय मिल जाए।

कहावत बदलनी पड़ेगी -“कुत्ते की दुम टेढ़ी रहती है” यह अब इंसानों के लिए है, क्योंकि हमारी न्याय व्यवस्था इंसान की रीढ़ को टेढ़ा कर देती है।

अगर एक कुत्ता सड़क पर काट ले तो सिस्टम हरकत में आता है। पुलिस, नगर निगम, कोर्ट सब जाग जाते हैं। पर अगर एक इंसान को न्याय चाहिए, तो उसे सालों जागते रहना पड़ता है। यह विडंबना नहीं तो क्या है? कुत्ते को 10 दिन में इंसाफ़ इसलिए मिला क्योंकि उसके लिए NGO खड़ा हो गया। क्योंकि यह ‘ट्रेंडिंग टॉपिक’ बन गया। मीडिया ने इसे तूल दिया। यानी, इंसाफ़ अब संवेदनाओं से नहीं, TRP और सोशल मीडिया से मिलता है। हमारी न्याय व्यवस्था और हम इंसानों को यह कुत्ता-कथा बहुत बड़ा सबक देती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका केस जल्दी सुलझे, तो या तो कुत्ता बन जाइए, या फिर कुत्ते का केस बन जाइए। इंसान के केस का तो कोई भविष्य नहीं।

अब सवाल यह है कि क्या हम इस सड़ते सिस्टम को देखकर रोएं, या उससे लड़ें? हकीकत यह है कि लड़ाई लड़नी पड़ेगी। क्योंकि अगर कुत्ते का केस 10 दिन में निपट सकता है, तो इंसान का क्यों नहीं? हमें सिस्टम को झकझोरना होगा। न्याय मांगने की भीख नहीं, उसका अधिकार जताना होगा।

कानून किताबों में नहीं, कोर्ट में जिंदा होना चाहिए।

इंसाफ़ पट्टियों में नहीं, फैसलों में दिखना चाहिए।

और हाँ, हमें कुत्तों से सीखना होगा हक़ के लिए जोर से भौंकना होगा!

किसी ने कहा था “मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणी है।” पर आज का सच यह है कि कुत्ते न्याय जीत रहे हैं और इंसान तारीखों में हार रहा है। अब यह आप पर है कि इंसान बने रहना है या कुत्ता बनकर अपने हक़ के लिए लड़ना है।

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