व्यंगकार -राजेंद्र सिंह जादौन
हेडलाइन देखकर धोखा मत खाइए! आपको लग रहा होगा कि खनन से रोजगार मिलेगा मजदूरों को, बेरोजगार युवाओं को, या फिर गांव के उन गरीबों को जो दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं। लेकिन हकीकत कुछ और है। *खनन से रोजगार मिलता है ,राजनीतिक नेताओं को बाहुबली बनने का,,अफसरों को मोटा कमीशन खाने का,और माफियाओं को ताज पहनने का!*
*बाकियों को? बाकियों को सिर्फ सिलिकोसिस, दमा, फेफड़ों का कैंसर और मौत का पैकेज डील।*
आपने अख़बारों में रोज़ ये लाइन पढ़ी होगी। टीवी चैनलों पर भी ये डायलॉग चलता है“खनिज माफिया बेलगाम, प्रशासन बेअसर।”कभी-कभी तो एंकर की आवाज़ इतनी भारी हो जाती है कि लगता है अभी हेलिकॉप्टर से उतरकर खुद माफिया पकड़ लेंगे। लेकिन अगले ही फ्रेम में वही एंकर माफिया के रेत वाले फार्महाउस पर बार्बेक्यू पार्टी कर रहा होता है।
अब सवाल उठता है ये माफिया कौन हैं?
किसी फिल्म के खलनायक जैसे? काले चश्मे, गाड़ी पर काले शीशे, हाथ में रिवॉल्वर? नहीं भाई, ये माफिया सफारी सूट पहनते हैं, माथे पर तिलक लगाते हैं, और जनता दरबार में फोटो खिंचवाते हैं। क्योंकि ये माफिया असल में माननीय विधायक जी, एक्स-मंत्री जी, और उनके खास चमचे जी हैं।
हाल ही में एक विधायक जी पर खनिज संसाधन वाले मामले में जुर्माना हुआ। अरे वाह! टीवी वाले भी चिल्लाए “देखिए कानून का राज, विधायक पर कार्रवाई।” लेकिन ज़रा जुर्माने की रकम देखिए, फिर उनके ठेके की रकम देखिए वो जुर्माना उनके लिए ऐसा है जैसे हमारे लिए चाय की एक प्याली का बिल।
जुर्माना भरने के बाद विधायक जी बोले होंगे “भाई, ये तो टिप्स समझकर रख लो, असली माल तो अगले टेंडर में आएगा।”
खनिज का व्यापार नीति बनाम लालच
खनिज संसाधन, अगर सही नियम और नीति के तहत कारोबार हो, तो प्रदेश की तकदीर बदल सकता है। रोजगार, सड़कें, विकास सब कुछ संभव है। लेकिन... जहां लालच हो, वहां नीति सिर्फ फाइलों में रहती है। लालच इंसान को माफिया बना देता है। आज की तारीख में खनन का मतलब है बुलडोज़र से खनन, नेता से अनुमति, और जनता से सहनशक्ति।
प्रकृति की बदला योजना
खनन से सिर्फ मिट्टी ही नहीं निकलती, लोगों की सांस भी निकल जाती है। गांव के गांव धूल में बदल रहे हैं, नदी के पेट में छेद हो रहे हैं, जंगल सूख रहे हैं। लेकिन नेताओं को फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उनकी डिक्शनरी में पर्यावरण शब्द नहीं, सिर्फ ठेका, रॉयल्टी, और कट लिखा है। और जब प्रकृति बदला लेती है, तब ये नेता गायब हो जाते हैं “अरे भाई, ये तो प्राकृतिक आपदा है। इसमें सरकार क्या कर सकती है?” लेकिन ये प्राकृतिक आपदा क्यों आई, ये सवाल कोई नहीं पूछता।
रोजगार का असली सच
अब जरा उस रोजगार की बात कर लेते हैं, जो नेताओं और अफसरों ने वादों में बांटा ।खनन से रोजगार किसको मिला? नेता जी के भतीजे को क्योंकि ठेका उसी को मिलेगा । अफसर जी के साले को क्योंकि सब-कॉन्ट्रैक्ट उसी को मिलेगा । और माफिया जी को क्योंकि असली खेल उन्हीं का है।
बाकी जनता?
उसे मिलेगा धूल का रोजगार। सुबह से शाम तक धूल फांकते मजदूर, बिना सेफ्टी किट, बिना मास्क, बिना दवाई। रात को सांस लेने के लिए संघर्ष। और फिर एक दिन सिलिकोसिस से मौत।
विकास के नाम पर विनाश
इन्वेस्टर्स मीट में बड़े-बड़े वादे हुए। मंच पर भाषण, नीचे चमचों की तालियां। कहा गया “खनिज उद्योग से प्रदेश में लाखों रोजगार।”
लेकिन हकीकत में ये रोजगार सिर्फ गिनती के घरों तक सीमित रहेगा ।जिन्हें से वादा किया गया, वो अब विस्थपित कहलाएगे और भी रोजगार के लिए भटकते रहेंगे। क्योंकि सिस्टम में एक ही नियम चलता है “जो झुकता है, वही ठेका पाता है।”
खनन से किसका पेट भर रहा है? नेताओं का? अफसरों का? माफियाओं का? या उस मजदूर का जो दिन-रात मिट्टी में धंसकर भी दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहा है? क्या ये खनन हमारे विकास की गारंटी है, या हमारी बर्बादी का कारण? और सबसे बड़ा सवाल क्या सरकारें माफिया को रोकेंगी, या फिर खनिज के नीचे दबकर जनता की आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी?
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