Saturday ,30th August 2025

पत्रकारिता मेरी वैचारिक लड़ाई है, इसे व्यक्तिगत कतई न लें!

राजेन्द्र सिंह जादौन

पत्रकारिता…!
ये सिर्फ एक पेशा नहीं, ये सिर्फ दो वक्त की रोटी कमाने का जरिया नहीं, ये सिर्फ टीवी स्क्रीन पर चेहरा चमकाने का नाम नहीं। मेरे लिए पत्रकारिता एक युद्ध है। एक ऐसा युद्ध जिसमें हथियार है कलम, और दुश्मन है सिस्टम का भ्रष्टाचार, झूठ और ढकोसला।लेकिन अफसोस! इस देश में जब आप सच लिखते हैं, तो लोग आपको पत्रकार नहीं, दुश्मन समझने लगते हैं। क्यों? क्योंकि सच हमेशा चुभता है। सच हमेशा परेशान करता है। सच हमेशा सवाल खड़े करता है। और ये सवाल जिनसे पूछे जाते हैं, उन्हें लगता है जैसे उनकी कुर्सी जल रही हो, उनका साम्राज्य ढह रहा हो।

मेरी कलम कभी व्यक्तिगत नहीं हुई… लेकिन लोग इसे जहर समझ बैठे!

मैंने कभी किसी की निजी जिंदगी में झांककर खबर नहीं बनाई। मैंने कभी किसी का करियर खत्म करने की साजिश नहीं रची। मेरी कलम हमेशा उस सिस्टम पर चली है, जिसने आम आदमी की उम्मीदों का गला घोंटा है। लेकिन क्या मिला बदले में? धमकियां। नफरत। मनभेद।
क्योंकि मेरे विचार से जिनके सिंहासन हिलते हैं, वे मुझे दुश्मन मान बैठते हैं।

वैचारिक मतभेद होना चाहिए… पर यहाँ लोग इसे मनभेद में बदल लेते हैं। अरे भाई! मेरा लिखा तुम पर नहीं, तुम्हारी गलतियों पर है। पर नहीं… हमारी राजनीति, हमारा समाज इतना संवेदनशील हो गया है कि अगर तुमने किसी पर सवाल उठा लिया तो वह आपको “निजी दुश्मन” घोषित कर देगा।
 मैं उस दौर में जी रहा हूं, जहाँ सच्चाई छिपाने के लिए करोड़ों खर्च हो जाते हैं। जहाँ झूठ को ग्लैमर की पैकिंग में परोसा जाता है। जहाँ सत्ता पर सवाल पूछना देशद्रोह कहलाता है। जहाँ पत्रकारिता का धर्म “सत्ता से सवाल” करना था, वहां आज कुछ लोग सिर्फ सत्ता की चाटुकारिता में लगे हैं। और ऐसे माहौल में अगर कोई कलम उठाकर सच लिखता है, तो उसे खरीदने की कोशिश होती है, डराने की कोशिश होती है, बदनाम करने की कोशिश होती है। लेकिन मेरी कलम बिकाऊ नहीं है। मेरी आत्मा समझौता नहीं करेगी। मैं वो लिखूंगा, जो जनता के हक में होगा। मैं वो बोलूंगा, जो सत्ता के कानों में आग लगा दे।

जिन्हें डर है, वे मुझसे नफरत करेंगे…

क्योंकि मैं उनके खिलाफ खड़ा हूं। क्योंकि मैं उनकी चापलूसी नहीं करता। क्योंकि मैं उनकी गलतियों पर पर्दा नहीं डालता। पर यह याद रखो मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं। मैं उस सोच का दुश्मन हूं, जो देश को खोखला कर रही है।

तुम्हें लगता है मैं तुम्हें बदनाम कर रहा हूं? नहीं! मैं तुम्हारे उस काम को उजागर कर रहा हूं, जो छुपा कर किया गया। गलती तुम्हारी है, खबर मेरी है। और खबर छपने से अगर तुम्हारी कुर्सी हिल रही है, तो इसका मतलब है कि कुर्सी गलत तरीके से हासिल हुई थी।

आज बहुत से लोग पत्रकारिता को नौकरी समझते हैं। एंकर बनना है, लाइमलाइट चाहिए, पैसों का पहाड़ चाहिए।” लेकिन मेरे लिए पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है।
एक मिशन है।

ये सिस्टम से लड़ाई है  उस सिस्टम से जो गरीब को और गरीब बना रहा है, जो भ्रष्ट को और ताकतवर बना रहा है।
मैं जानता हूं इस लड़ाई में मुझे गालियां मिलेंगी। धमकियां मिलेंगी। बदनाम किया जाएगा।लेकिन अगर इन सब से डर गया तो फिर मेरा होना बेकार है। क्योंकि पत्रकारिता का धर्म है सत्ता से सवाल करना, न कि सत्ता के तलवे चाटना।

मुझे बिना समझे जज मत करो…

बिना मुझे जाने, बिना मेरी सोच को समझे, मुझे जज मत करो। क्योंकि मैं जो लिखता हूं, वह मेरे निजी फायदे के लिए नहीं होता। मैं सच के लिए लिखता हूं। मैं जनता के हक के लिए लिखता हूं। और अगर तुम्हें इससे दर्द होता है, तो इसका मतलब है कि तुम्हारे अंदर कहीं न कहीं गलती है।

अगर मेरी कलम से तुम्हारी नींद उड़ जाती है, तो समझ लो कि तुम्हारा काम संदिग्ध है। अगर मेरे शब्दों से तुम्हारा दिल जलता है, तो समझ लो कि तुम्हारी सत्ता की नींव कमजोर है। क्योंकि मेरी पत्रकारिता तलवार नहीं, आईना है। और जो आईने से डरते हैं, वे वही होते हैं जिनका चेहरा दागदार होता है।

पत्रकारिता मेरी वैचारिक लड़ाई है। इसे व्यक्तिगत कतई मत लो। क्योंकि अगर सच से डरते हो तो झूठ से दोस्ती कर लो। लेकिन मेरी कलम से उम्मीद मत रखो कि वह झुकेगी।

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