झोला छाप खबरी
सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार देश की सड़कों पर घूमते हिंसक कुत्तों पर अपना फैसला सुना दिया। आदेश साफ है इन्हें छोड़ा नहीं जाएगा, नियंत्रित किया जाएगा और समाज की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी। यह फैसला स्वागत योग्य है, क्योंकि एक हिंसक जानवर इंसानी जान की कीमत नहीं समझता।
लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल खड़ा होता है . सड़क के हिंसक कुत्तों पर कानून लग सकता है, तो सत्ता के गलियारों में घूमते उन हिंसक कुत्तों का क्या जिनके दाँत और ज़्यादा नुकीले हैं?
ये वो कुत्ते हैं जो चुनावी मौसम में ज़हर उगलते हैं, समाज को धर्म और जाति के नाम पर काटते हैं। ये वो हैं जो सत्ता की हड्डी के लिए खून की नदी बहाने में भी पीछे नहीं हटते। इनकी भौंक से दंगा भड़कता है, इनके इशारों पर भीड़ उन्माद में बदल जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि ये चार पैरों पर नहीं, दो पैरों पर चलते हैं कपड़े पहनते हैं, भाषण देते हैं, लोकतंत्र का मुखौटा लगाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंसक कुत्तों को खुले छोड़ना खतरनाक है। बिल्कुल सही कहा। पर क्या इन ‘मानव कुत्तों’ को खुला छोड़ना कम खतरनाक है? सड़क का कुत्ता अधिकतम एक आदमी को काटेगा, लेकिन ये सत्ता के हिंसक कुत्ते पूरे समाज को काटते हैं सदियों की भाईचारे की डोर को नोच डालते हैं।
फर्क देखिए सड़क के कुत्ते को पकड़कर बंधक बना लिया जाएगा, नसबंदी कराई जाएगी। लेकिन राजनीतिक हिंसक कुत्तों को सत्ता का लाल कालीन बिछा कर सम्मानित किया जाता है। उनके लिए जेलें नहीं,विधानसभा और संसदें हैं। उनके भौंकने पर कानून भी पूंछ हिलाता है।
तो सवाल है? क्या सुप्रीम कोर्ट कभी उन पर भी ऐसा ही सख्त फैसला सुनाएगा? क्या समाज कभी तय करेगा कि हिंसा सिर्फ सड़क पर नहीं, सत्ता के गलियारों में भी खतरनाक है? या फिर हम यथास्थिति स्वीकार कर लेंगे और उनकी दहाड़ के बीच लोकतंत्र को चीरते देखेंगे?
क्योंकि असली खतरा उन कुत्तों से नहीं है, जो सड़कों पर घूमते हैं। असली खतरा उनसे है, जो सत्ता के नाम पर खून से खेलते हैं। फर्क सिर्फ इतना है उनके लिए हड्डी सत्ता है और शिकार लोकतंत्र।
Comment Now