माननीय मुख्यमंत्री श्री मोहन यादव जी,
मध्यप्रदेश शासन
नमस्कार,
एक छोटा-सा सवाल है पत्रकारों को शासकीय आवास कैसे आवंटित होते हैं? क्या इसके लिए भी वही पुराना फॉर्मूला चलता है ब्रांड बड़ा हो, चैनल का नाम चमकदार हो, और मालिक करोड़पति हो तो सब सुविधा मिल जाती है?
मैं यह इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि मैं उन भाग्यशाली पत्रकारों में से नहीं हूँ जो किसी बड़े उद्योगपति के अखबार में मलाई खाते हों, न ही उन चैनलों में हूँ जिनके कैमरे के आगे आपके बयान देने के लिए मंत्रीगण लाइन लगाते हैं।
मैं एक ‘झोला-छाप’ खबरी हूँ। हाँ, वही जो खुद अपने पैसों से जनता के लिए सच्चाई खोजता है। न जनसंपर्क के प्रेस नोट छापता हूँ, न आपके हर शब्द को भगवान का प्रवचन बनाकर परोसता हूँ। मेरा ब्रांड है “सर्च स्टोरी”, जो केवल कलम और सच्चाई से चलता है, करोड़ों के फंड से नहीं।
अब सवाल ये है कि क्या लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता का कोई मूल्य है? या फिर आजादी सिर्फ किताबों में लिखी एक लाइन बनकर रह गई है? क्योंकि अगर हर सुविधा बड़े नाम और बड़े घरानों के लिए ही है, तो मान लीजिए लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब महलों का चौकीदार बन चुका है।
अगर आपको सच में लगता है कि भारत आज भी स्वतंत्र है और हर नागरिक को उसके अधिकार मिलना चाहिए, तो मैं आपसे विनम्र निवेदन करता हूँ मुझे भी शासकीय दर पर शासकीय आवास देने पर विचार करें। ताकि साबित हो सके कि सरकार सिर्फ बड़े-ब्रांडेड पत्रकारों की नहीं, बल्कि उन लोगों की भी है जो सच्चाई को झोले में लेकर जनता तक पहुंचाते हैं।आपका यह फैसला न सिर्फ मुझे छत देगा, बल्कि लोकतंत्र की उस दीवार को भी खड़ा रखेगा जो आजकल विज्ञापन के बोझ तले झुकती जा रही है।
सादर,
राजेन्द्र सिंह जादौन
पत्रकार
“सर्च स्टोरी”
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