Saturday ,30th August 2025

“दो गज़ ज़मीन और लावारिसों का कफ़न 82 साल का राधेश्याम अग्रवाल और हमारा सिस्टम”

राजेन्द्र सिंह जादौन
आज के भारत में, जहां एक नेता की मूर्ति बनाने में करोड़ों का बजट लगता है, जहां एक मंत्री की कार के लिए लाखों रुपये के टायर बदल दिए जाते हैं, वहीं एक लावारिस लाश को दो गज़ ज़मीन दिलाने के लिए 82 साल का बूढ़ा भाग-दौड़ करता है।
ये कहानी है राधेश्याम की। उम्र  82 साल। ताकत  किसी युवा से कम नहीं। मिशन  लावारिस लाशों को सम्मान के साथ विदाई देना।

सोचिए, जब हम सब अपने परिवार के लिए आलीशान मकान बनाने की होड़ में लगे हैं, जब लोग करोड़ों रुपये की प्रॉपर्टी खरीदकर पीढ़ियों को सुरक्षित कर रहे हैं, तब यह बूढ़ा इंसान अपने लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए दो गज़ ज़मीन ढूंढ रहा है जिन्हें मरने के बाद भी कोई अपना नहीं मिला।

सरकार और योजनाओं का सच जिंदा आदमी ब्रांड है, लाश सिर्फ बोझ हमारी सरकारें जन्म के समय शगुन देती हैं।
मां और बच्चे के नाम पर योजनाएं चलती हैं। तस्वीरें खिंचती हैं।
अखबारों में विज्ञापन छपते हैं “हम बेटी बचाओ, हम जननी सुरक्षा में नंबर वन हैं!” लेकिन मरने के बाद? जब कोई लावारिस सड़क पर सड़ता है, तब ये योजनाएं किस काम की? क्या कभी किसी मुख्यमंत्री ने ट्वीट किया कि “आज हमने एक लावारिस लाश का सम्मानजनक अंतिम संस्कार किया”? नहीं। क्योंकि यहां मौत न्यूज़ नहीं, टीआरपी नहीं, बस गंध है।

यही सिस्टम है जो ज़िंदा आदमी को वोट बैंक मानता है और लाश को बोझ। और इस गंदे सच को झुठलाते हुए राधेश्याम जैसे लोग आगे आते हैं। वो सरकार से फंड नहीं मांगता, वो सेल्फी नहीं खिंचवाता। वो बस अपने झोले में इंसानियत लेकर निकलता है और उन लाशों को वो सम्मान देता है, जो शायद उन्होंने जिंदगी में भी नहीं पाया।

82 साल का राधेश्याम – बूढ़ा नहीं, ज़िंदा लोकतंत्र का सबूत है

कहते हैं, 60 के बाद आदमी रिटायर हो जाता है। 70 पर बस चारपाई पकड़ लेता है। लेकिन यह 82 साल का बूढ़ा किसी युवा से ज्यादा दमदार है।
क्यों? क्योंकि उसके पास पैसा नहीं, लेकिन इरादा है। उसका शरीर थक सकता है, लेकिन उसकी आत्मा नहीं। जब किसी थाने से फोन आता है कि “एक लावारिस लाश पड़ी है”, तो सबसे पहले जो नाम दिमाग में आता है, वो है  राधेश्याम अग्रवाल।

सोचिए…
जिस उम्र में लोग खुद अपने लिए डॉक्टर ढूंढ रहे होते हैं, इस उम्र में ये आदमी लाश के लिए कफ़न ढूंढ रहा है। जिस दौर में लोग अंतिम संस्कार के लिए पांच सितारा श्मशान की बुकिंग कर रहे हैं, राधेश्याम सड़क किनारे से शुरू करके श्मशान घाट तक अकेले चलता है। उसकी आंखों में न डर है, न घृणा। उसके लिए यह लाश सिर्फ मांस का ढेर नहीं, बल्कि एक अधूरी कहानी है  जिसे वो इज़्ज़त के साथ ख़त्म करना चाहता है। और हमारा समाज? लाश के पास सेल्फी लेने वाला, लेकिन मदद के नाम पर जीरो

किसी सड़क पर लावारिस लाश पड़ी हो तो क्या होता है? लोग मोबाइल निकालते हैं। वीडियो बनाते हैं। स्टेटस डालते हैं “हे भगवान! इंसानियत मर गई” लेकिन दो कदम आगे बढ़कर कफ़न देने की हिम्मत किसी में नहीं।
क्यों? 
क्योंकि ये काम राधेश्याम जैसे पागल करते हैं। समाज ने इंसानियत को ठेके पर दे रखा है। और राधेश्याम वो ठेकेदार नहीं है जिसे पैसा मिलता है। वो वो आदमी है जिसे सिर्फ सुकून मिलता है।

 5 करोड़ की कार और 500 रुपये का कफ़न

नेताओं की कार पर 5 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं, लेकिन एक लावारिस इंसान को 500 रुपये का कफ़न देने वाला कोई नहीं। शहर में करोड़ों के फ्लाईओवर बन सकते हैं, लेकिन दो गज़ ज़मीन के लिए राधेश्याम को हर बार जद्दोजहद करनी पड़ती है। हमारे देश में मूर्ति के लिए जगह है, लेकिन मौत के बाद इंसान के लिए जगह नहीं।

सरकार से सवाल  जब योजनाएं हैं, तो लाश क्यों लावारिस है?

मुख्यमंत्री जी, ये सवाल सिर्फ आपसे नहीं, हर उस सत्ता से है जो खुद को जनता का सेवक कहती है। जब आप जन्म पर योजनाएं दे सकते हैं, शादी पर अनुदान दे सकते हैं, तो मौत पर चुप क्यों हैं? क्या लोकतंत्र में सिर्फ जिंदा आदमी का वोट मायने रखता है, या मरने के बाद उसकी इज़्ज़त भी?

राधेश्याम सरकार से सवाल नहीं करता, वो काम करता है। लेकिन उसका हर कदम इस सिस्टम पर तंज है “तुम लोग जहां सिर्फ भाषण में इंसानियत ढूंढते हो, मैं उसे अपनी झोली में लेकर घूमता हूँ।”

राधेश्याम का संदेश – इंसान जिंदा हो या लाश, सम्मान का हकदार है।

82 साल का ये आदमी हमें सिखा रहा है कि इंसानियत उम्र की मोहताज नहीं। अगर बूढ़ा आदमी कर सकता है, तो हम क्यों नहीं? आज उसके पास फंड नहीं, लेकिन इरादा है। उसका मिशन है कि कोई लाश सड़क पर सड़ने न पाए। क्योंकि मौत के बाद इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत होती है सिर्फ दो गज़ ज़मीन और एक कफ़न की।

और यही सबसे बड़ा व्यंग्य है हम ज़िंदगी भर जमीन के लिए लड़ते हैं, लेकिन आखिर में तो दो गज़ ही चाहिए। और उस दो गज़ के लिए आज भी एक 82 साल का बूढ़ा दौड़ रहा है… क्योंकि सिस्टम सो रहा है।

 राधेश्याम, सिस्टम से बड़ा है

ये कहानी सिर्फ एक बूढ़े की नहीं, बल्कि हमारी सोच की है।
हमने इंसानियत को पोस्ट और लाइक तक सीमित कर दिया है।
हम सरकारों से उम्मीद करते हैं, लेकिन खुद कुछ नहीं करते।
और जब राधेश्याम जैसे लोग हमें आईना दिखाते हैं, तो हम बस ताली बजाते हैं।

अगली बार जब किसी सड़क पर लाश दिखे, तो ये मत कहना “इंसानियत मर गई”। क्योंकि इंसानियत नहीं मरी है, वो 82 साल के राधेश्याम के रूप में जिंदा है। सवाल ये है  क्या हम जिंदा हैं?

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