(व्यंगकार -पत्रकर्मी है )
व्यंग पढ़ने से पहले आपको ये भी जानना जरूरी है । भारतीय संविधान में जानवरों के अधिकारों को सीधे तौर पर "अधिकार" के रूप में नहीं बताया गया है, लेकिन कुछ अनुच्छेद और प्रावधान जानवरों के प्रति दया और संरक्षण की भावना को दर्शाते हैं। अनुच्छेद 51ए(जी) में "वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने और सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया रखने" को प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताया गया है. इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 48ए में "राज्य, पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने और देश के वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा" कहा गया है, according to Finology Insider. सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों में जानवरों के अधिकारों की बात की है, जिसमें अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार को शामिल किया गया है, according to The Amikus Qriae.
व्यंग
जंगल हो या शहर सच यही है कि यहाँ सब जानवर हैं। फर्क बस इतना है कि जंगल वाले दहाड़ते हैं और शहर वाले भाषण देते हैं। जंगल में शेर शिकार करता है, तो शहर में इंसान अदालत-कानून, राजनीति और संविधान का सहारा लेकर दूसरे का हक खा जाता है।
सोशल एनिमल या घरेलू जानवर?
अरस्तू ने इंसान को सोशल एनिमल कहा था। इंसान झुंड में जीना चाहता है, उसे समाज चाहिए। यही कारण है कि वह गाँव बसाता है, शहर खड़ा करता है, संसद बनाता है और फिर उस पर ताला डालने के लिए कानून भी। लेकिन सवाल उठता है. क्या यह सामाजिकता इंसान को आज़ादी देती है, या कैद?
जंगल का जानवर खुला है, जबकि इंसान “सभ्य” होने के नाम पर घर, समाज और राजनीति के पिंजरे में बंधा है।
आर्टिकल 21 – जीने का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है “किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त वंचित नहीं किया जाएगा।”यानी हर इंसान को जीने का हक है। लेकिन न्यायपालिका ने इसे और विस्तार दिया सिर्फ इंसान ही नहीं, जानवरों को भी जीने और सम्मान से रहने का हक है । सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जानवर भी संवेदनशील प्राणी हैं। उन्हें पीड़ा देने का मतलब है, जीवन के अधिकार का हनन।
अब सोचिए जंगल का शेर तो खुले में रहता है। पर इंसान जिसे संविधान मिला, अदालत मिली, लोकतंत्र मिला वही सबसे ज्यादा बंधा हुआ है। जानवर अपने स्वभाव से जीते हैं, पर इंसान कानून और दिखावे से जीने को मजबूर है।
सभ्यता का असली मतलब?
जानवर भूख लगने पर शिकार करता है और तृप्त होकर लौट जाता है। इंसान भूख से ज्यादा लालच का शिकार है। वह मॉल, बाजार, राजनीति और धर्म सबको अपने पेट में भर लेना चाहता है। इंसान सभ्य कहलाने के चक्कर में जंगल के जानवर से ज्यादा खतरनाक बन चुका है। शेर एक हिरण मारकर रुक जाता है, पर इंसान पूरा जंगल साफ कर देता है और फिर भाषण देता है –“हम प्रकृति से प्रेम करते हैं।”
आज हालत ये है कि जानवरों को जीने का अधिकार संविधान देता है, पर इंसानों को जीने के लिए जानवरों की खाल पहननी पड़ती है कभी राजनीतिक शेर बनकर, कभी धार्मिक बाघ बनकर, तो कभी समाजवादी गधा बनकर। सवाल यह है कि जब कानून जानवरों को भी जीने की आज़ादी देता है,तो क्या इंसान सचमुच आज़ाद है? या वह अपनी बनाई राजनीति, जाति, धर्म और कानून की जंजीरों में खुद ही पालतू बन चुका है?
यहाँ सब जानवर हैं फर्क बस इतना है कि जंगल वाला ईमानदार है और समाज वाला चालाक। जंगल का जानवर खुला और आज़ाद है, जबकि इंसान खुद को सभ्य कहकर गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ। संविधान और आर्टिकल 21 ने भले ही इंसानों को और कानून ने जानवरो को बराबर जीवन का अधिकार दिया हो, लेकिन असलियत यह है कि
जानवर अपने स्वभाव से जी रहा है और इंसान अपनी बनावटी सभ्यता से मर रहा है।
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