राजेन्द्र सिंह जादौन
लेखक -एक पत्रकर्मी है
टीवी ऑन करते ही एक मुस्कुराता हुआ चेहरा “सरकार आपकी सेवाओं में तत्पर है।”
जनता सोचती है “वाह! क्या सरकार है! इतना काम कर रही है!” और उधर सरकार सोच रही है “वाह! जनता अभी भी विज्ञापन देखकर खुश है, असली काम करने की ज़रूरत नहीं।”
सरकारी विज्ञापन का मंत्र ठीक वैसा ही है . माथा देखो और तिलक करो? भाई, यह तो वैसा ही है जैसे चित्रकूट के घाट पर,भई संतन की भीर, तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक करे रघुवीर' चैनल कहता है “हमारा चैनल सबसे ज्यादा देखा जाता है!”सरकार कहती है “ठीक है, ये लो करोड़ों का विज्ञापन!” बाद में पता चलता है कि चैनल के दर्शक सिर्फ वही लोग हैं जो चैनल के मालिक के घर में रहते हैं।
कागज़ों पर सब कुछ चमकदार है।
टेंडर ।
चैनल ।
विज्ञापन।
लेकिन असली खेल तो कैमरे के पीछे है कौन कितना कमीशन देगा, कौन किस नेता के करीब है, और किसके चैनल पर किसकी फोटो ज्यादा चमकेगी। यहां योग्यता की नहीं, चापलूसी की बोली लगती है।
क्या आपने कभी ऐसे चैनल का नाम सुना है, जो आपने अपनी ज़िंदगी में कभी ऑन ही नहीं किया? फिर भी उसके पास सरकारी विज्ञापन का ठेका है।
क्यों? क्योंकि वहां टीआरपी नहीं, सेटिंग काम करती है। न्यूज़ रूम में खबरें नहीं बनतीं, बिल बनते हैं। और ये बिल जनता के टैक्स से भरे जाते हैं। यानि “आपके पैसे से सरकार अपने फोटोशूट करवाती है।”
सरकारी विज्ञापन को कहते हैं “जनहित का संदेश”। पर असली संदेश है “देखो, हम कितने अच्छे हैं”। अस्पतालों में दवा नहीं, स्कूलों में बेंच नहीं, लेकिन टीवी पर चमचमाते विज्ञापन ज़रूर मिलेंगे।
क्योंकि वोट अस्पताल से नहीं, टीवी स्क्रीन से आते हैं।
जनता – “साहब, सड़क कब बनेगी?”
नेता – “टीवी देखो, वहां तो बन गई है!”
जनता – “अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं।”
नेता – “विज्ञापन में सब मुस्कुरा रहे हैं, और क्या चाहिए?”
जनता – “बिजली नहीं आती।”
सरकार – “टीवी देखना बंद करो, मोबाइल पर हमारा विज्ञापन देखो।”
जनसंपर्क का असली मतलब है ।“सत्ता और चैनल का मेल”। जनता का पैसा, चैनलों की जेब में।
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