राजेन्द्र सिंह जादौन
बाबूलाल गौर प्रदेश की राजनीति का वो ‘दमदार’ चेहरा जो सिस्टम पर भारी पड़ा मध्यप्रदेश की राजनीति में कई नाम आए और चले गए, लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सत्ता की कुर्सी से उतरने के बाद भी दिमाग और दिल पर छाप छोड़ जाते हैं। बाबूलाल गौर ऐसा ही नाम है। वे सिर्फ नेता नहीं थे, बल्कि प्रदेश की राजनीति में ‘दमदारी’ की परिभाषा थे।
जब बात बीजेपी के पुराने दौर की होती है, जब पार्टी सत्ता में आने के लिए संघर्ष कर रही थी, तब बाबूलाल गौर संगठन से लेकर सड़क तक की राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी थे। और यही वजह है कि मुख्यमंत्री का कार्यकाल भले ही छोटा रहा हो, लेकिन मंत्री के तौर पर उनकी छवि अडिग और प्रभावशाली रही।
गौर साहब को ‘दमदार’ मंत्री कहा जाता था क्योंकि वे फैसले लेने से कभी नहीं डरते थे। गृह मंत्री रहते हुए उन्होंने पुलिस महकमे को सिर्फ आदेशों का गुलाम नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें जिम्मेदारी और जवाबदेही का पाठ पढ़ाया।
गैंगस्टरों पर नकेल कसना हो या दंगाइयों को सख्त संदेश देना, गौर का अंदाज सीधा और स्पष्ट था कानून तोड़ोगे, जेल जाओगे। अफसरशाही को भी पता था कि बाबूलाल गौर के सामने बहाने नहीं चलेंगे। वे फाइलों को सालों दबाकर रखने वाले मंत्री नहीं थे।
उनकी छवि उस दौर में भी मजबूत रही जब प्रदेश में ‘लॉ एंड ऑर्डर’ सबसे बड़ा मुद्दा था ।उनका ये डायलॉग खूब मशहूर हुआ “मैंने राजनीति में आकर किसी को दबाया नहीं, लेकिन किसी से दबा भी नहीं।” यही लाइन उनकी राजनीति का सबसे बड़ा परिचय है।
बीजेपी में रहकर भी बाबूलाल गौर ने हमेशा ये संदेश दिया कि उनका पहला कर्तव्य जनता के प्रति है, पार्टी के प्रति बाद में। कई बार उनके बयान पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी करते, लेकिन गौर साहब को इसकी परवाह नहीं थी। वे कहते “नेता वही जो सच बोले, चाहे किसी को बुरा लगे।” यही बेबाकी उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती थी। जब नेता चुप रहते थे, तब बाबूलाल गौर सिस्टम पर चोट करने में पीछे नहीं हटते।
गौर का कद सिर्फ मंत्रालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं था। वे भोपाल की राजनीति के निर्विवाद मास्टर थे। जिस सीट से उन्होंने चुनाव लड़ा, वहां विपक्ष जीत का सपना ही देखता रह गया। लगातार 10 बार विधायक चुना जाना उनकी पकड़ और रणनीति का प्रमाण है। भाजपा संगठन में उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि विरोधी दल ही नहीं, कभी-कभी अपने भी उनके सामने चालें चलने से पहले सोचते थे।
2004 में वे मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी पहचान मुख्यमंत्री से ज्यादा एक ऐसे मंत्री की रही जिसने अपनी शर्तों पर काम किया। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने बड़े उद्योगों के लिए नीति बनाई, नगरीय विकास पर फोकस किया, लेकिन असली पावर उनकी गृह और नगरीय प्रशासन की कमान में नजर आई।
गौर साहब के बयानों ने कई बार सुर्खियां बटोरीं। कभी विपक्ष को करारा जवाब, तो कभी पार्टी नेताओं को आईना दिखाना। ये विवाद उनके लिए कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत थे। क्योंकि इन बयानों ने ये साबित किया कि गौर साहब किसी से डरते नहीं।
आज की राजनीति में जहां नेता पीआर टीम और स्क्रिप्टेड भाषणों पर निर्भर हैं, वहां बाबूलाल गौर जैसे नेता दिल से बोलते थे, दम से फैसले लेते थे और जनता के बीच सच्चे अर्थों में रहते थे। उनकी सबसे बड़ी ताकत ये थी कि वे सत्ता के गुलाम नहीं थे, बल्कि सत्ता को अपने दम पर चलाने वाले मंत्री थे।
मध्यप्रदेश में आज भी जब ‘दमदार मंत्री’ की बात होती है, तो सबसे पहले नाम बाबूलाल गौर का आता है। उनकी बेबाकी, जमीनी पकड़, और प्रशासनिक सख्ती ने उन्हें प्रदेश की राजनीति में वो मुकाम दिया जो कम ही नेताओं को मिलता है।
वे ये साबित करके गए कि पार्टी की लाइन, पद की मजबूरी और सत्ता की सीमाएं दमदार नेता को नहीं रोक सकतीं। गौर साहब ने राजनीति को दिखाया कि सत्ता पाने से बड़ा काम सत्ता को सही तरीके से इस्तेमाल करना है जनता के लिए, मजबूरी के लिए नहीं।
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