(लेखक एक पत्रकर्मी है )
कोई भी सरकार, महिलाओं के साथ अपराधों पर सख्ती दिखाना समाज की ज़रूरत है क्योंकि लंबे समय तक महिलाएँ संरचनात्मक भेदभाव और हिंसा की शिकार रही हैं। लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है कि पुरुष पीड़ित कहाँ खड़े हैं?
सच्चाई यह है कि पुरुष भी पीड़ित होते हैं घरेलू हिंसा, झूठे दहेज और रेप केस, यौन उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना, साइबर ब्लैकमेलिंग,छेड़छाड़ के झूठे केस, कार्यस्थल पर शोषण जैसी घटनाएँ पुरुषों के साथ भी होती हैं।
लेकिन कानूनी ढांचा और सरकारी नीतियाँ अधिकतर महिलाओं की सुरक्षा पर केंद्रित हैं। पुरुषों के लिए न तो डॉमेस्टिक वायलेंस एक्ट में जगह है, न ही यौन उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए कोई ठोस कानून।
जब कोई पुरुष शिकायत लेकर जाता भी है, तो पुलिस और समाज दोनों ही गंभीरता से नहीं लेते। परिणामस्वरूप वे चुपचाप सहने पर मजबूर रहते हैं।
(राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) में पुरुषों के खिलाफ अपराध का अलग से कोई कॉलम ही नहीं है।
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