Tuesday ,21st May 2024

‘अच्छे’ दिन का एक और संकेत : धार्मिक शत्रुता के मामले में दुनिया भर में भारत का नंबर चौथा

लीजिए, ‘अच्छे दिनों’ का एक और संकेत मिल गया. हमने पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और फ़लस्तीनी इलाक़े को पछाड़ दिया. इतना ही नहीं अब हम सिर्फ़ सीरिया, नाइजीरिया और इराक़ से पीछे हैं. तीन ऐसे देशों से, जो गृहयुद्ध भी झेल रहे हैं और बाहरी आक्रमण भी.
आप कहेंगे कि हम सुपर पॉवर बनने वाले हैं और हमारी इन देशों से भला क्या तुलना? सच में तुलना होनी तो नहीं चाहिए थी लेकिन यह ‘अच्छे दिन’ लाने का वादा करने वालों की ही उपलब्धि दिखती है कि भारत की तुलना इन देशों से हो रही है. और वो भी समाज में बढ़ती धार्मिक शत्रुता या वैमनस्यता के लिए.
अमरीका के प्यू रिसर्च सेंटर ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि समाज में धार्मिक शत्रुता के मामले में दुनिया भर में भारत का नंबर चौथा है. सीरिया, नाइजीरिया और इराक़ के ठीक बाद. इस सूची में अफ़ग़ानिस्तान आठवें और पाकिस्तान नौवें नंबर पर हैं.प्यू रिसर्च सेंटर अमरीकी संस्था है, जो अपने परिचय में कहती है कि वह अमरीका और दुनिया भर की स्थिति पर बिना किसी पक्षधरता के स्वतंत्र रिपार्ट प्रकाशित करती है. यह रिपोर्ट कई तरह के शोध और आंकड़ों के विश्लेषण से तैयार की जाती है.

हफ़िंगटन पोस्ट की ख़बर के अनुसार प्यू ने यह रिपार्ट अमरीकी विदेश विभाग, संयुक्त राष्ट्र, कुछ बहुराष्ट्रीय एजेंसियों और कुछ अंतरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संगठनों की रिपोर्ट के आधार पर प्रकाशित की है.इस रिपोर्ट को वैसे तो पश्चिमी देशों की साज़िश कहकर खारिज किया जा सकता था. लेकिन दुर्भाग्य से यह रिपोर्ट लगभग ऐसे समय में तैयार की हुई है जब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमरीका की यात्राएं कर रहे थे और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से उनकी ‘दोस्ती’ इतनी प्रगाढ़ हो गई थी कि वे ‘मिस्टर प्रेसिडेंट’ को बेतल्लुफ़ी से सीधे बराक बुलाने लगे थे.
यह रिपोर्ट ऐसे समय में भी प्रकाशित हुई है जब भारतीय जनता पार्टी की पूरी फ़ौज एक के बाद एक कई महत्वपूर्ण चुनाव जीतने के बाद खुली आंखों से सपने देख रही है कि भारत दुनिया की महाशक्ति अब बना कि तब. चिंता की बात यह भी है कि यह रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2014 की तुलना में 2015 में स्थिति बिगड़ी है. 2014 में भारत अपने पड़ोसी और ‘कट्टर दुश्मन’ देश पाकिस्तान से कम से कम पीछे था.

इससे कौन इनकार कर सकता है कि इस बीच ऐसे कई मुद्दों पर विवाद बढ़ा है जिसका स्वरूप चाहे जो हो वह ख़त्म किसी धार्मिक संकेत के साथ ही होता है. चाहे वो गोरक्षा का मसला हो, बीफ़ का मुद्दा हो या फिर उबाल मारते देशभक्ति का. आरएसएस की सभी संस्थाओं, चाहे वह भाजपा हो, विहिप हो, बजरंग दल हो या फिर कुछ और, सभी की सोच एक जैसी है. और इन सभी के लिए देशभक्ति का मतलब भारत से प्रेम उतना नहीं रहा है जितना कि पाकिस्तान से घृणा. और पाकिस्तान का नाम आते ही इन संस्थाओं के उत्साही कार्यकर्ताओं को हर मुसलमान में एक पाकिस्तानी या देशद्रोही दिखने लगता है. इस बीच दलितों से भी आरएसएस की संस्थाओं का अच्छा ख़ासा दुराव और टकराव हुआ है और ज़ाहिर है कि सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने अपनी रिपोर्टों में इसका ज़िक्र अवश्य किया होगा.
अगर आपको मई 2014 के लोकसभा चुनाव का प्रचार याद हो तो यह अवश्य याद होगा कि वादा ऐसा भारत देने का नहीं था. वादा तो ऐसा भारत देने का था जो सिर्फ़ आम भारतीयों के सपनों में था. एक विकसित भारत जो विज्ञान से लेकर ज्ञान तक सभी क्षेत्रों में अब पीछे मुड़कर देखने वाला नहीं है. इस भारत में वह सब होने वाला था जो ‘पिछले सत्तर सालों में नहीं हुआ’. लेकिन हो सब उल्टा ही रहा है. देश में माहौल ऐसा हो गया है मानों हम आगे नहीं बल्कि पीछे लौट रहे हैं.
इस समय देश की सबसे बड़ी समस्या ग़रीबी, भुखमरी, कुपोषण और बेरोज़गारी नहीं है बल्कि ‘तीन तलाक’ है. भ्रष्टाचार से निपटने से ज़्यादा अहम हमारे लिए बीफ़ बेचने वालों से निपटना हो गया है. विकास के पैमाने मानों बदल गए हैं और दुनिया को समझ में नहीं आ रहा है.

अभी नरेंद्र मोदी जी के पास बहुमत है. यह वर्ष 2019 तक बरक़रार रहेगा. तब तक वे देश को कहीं भी पहुंचा सकते हैं. इस देश का दुर्भाग्य है कि वह अब तक ऐसी एक भी योजना को पहचान नहीं सका है जो इस देश का भाग्य बदलने वाली है. हो सकता है कि किसी जादूगर की भांति नरेंद्र मोदी जी अभी कोई ऐसा कारनामा कर दिखाएंगे कि प्यू से लेकर मूडीज़ तक सब चकित रह जाएंगे और सबको अपनी रिपोर्ट पलटनी पड़ेगी. तब तक आप ख़ुश रहिए कि आपने पाकिस्तान को पछाड़ दिया है.

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