Thursday ,25th July 2024

सबकुछ बेचकर मीडिया को ख़रीदलो ....?

 

मीडिया उन मुद्दों को नहीं उठा रहा है, न बहस करता है जो देश की प्रगति में बाधक बने हुए या जिनसे देश की प्रगति संभव हो सकती है।ऐसी स्थितियाँ अकसर सरकार के विरुद्ध चली जाया करती हैं। एक तरह से उनमें वह स्वच्छंदता नहीं है जो वास्तव में उनमें होनी चाहिये। वह भयभीत सा है और सरकार के गुणगान में तल्लीन है। जिस किसी ने ऐसा किया भी है उसे न केवल सरकार के कोप भाजन का शिकार होना पडा है बल्कि सोशल मीडिया पर बदनामी अलग से झेलनी पडी है।

ऐसे गुणगान से सरकार को न तो कमियाँ पता चल पाती है न उन्हे दूर कर पाने के उपाय ही पता चल पाते है जिन्हें समय रहते दूर किया जा सके। इसी का परिणाम है कि देश की आर्थिक प्रगति प्रभावित हो रही है और देश में अशांति फैली हुई है। वे पत्रकार भी नेपथ्य में चले गये हैं जो एक तरह से खोजी पत्रकार कहलाते हैं।

आज देशवासियों को यह नहीं पता होगा कि क्या उज्जवला योजना है सिवाय इसके कि यह ग़रीबों को दी जाने वाली गैस की मुफ़्त सुविधा है।कितनी मुफ़्त है और क्यों असफल है? कभी चर्चा में रही ही नहीं है।

यही हाल 50 करोड़ लोगों यानि आधे भारत को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने वाली आयुष्मान भारत योजना का है। किसी को कुछ पता नही है?

जीएसटी लागू करने में क्या क्या समस्याये लोग झेल रहे है और क्यों इसका करसंग्रह बढ नहीं पा रहा है जिसके कारण आम व्यक्ति कर का अनावश्यक बोझ ढोने को मजबूर है, कभी बहस में आया ही नहीं है?

चुनावी बांड काले धन को दूर करने में कितने सक्षम है, कोई नहीं जानता?

लगभग सभी बैंकें चौपट हुई पडी हैं जिनमें पीएमसी व यस बैंकें तो दिवालिया घोषित हो चुकी हैं। क्यों और कैसे? इनकी वास्तविकता किसी को नहीं पता। मीडिया में बहस होती तो समस्याये दूर करने के ढेरों उपाय वह भी इनके विशेषज्ञों से आराम से मिल जाते।

पर करे कौन? गुणगान में बस लगे रहना है।यही देशहित होकर रह गया है?

सबसे पहले यह जान लीजिए कि मीडिया के तीन रूप हैं- प्रिंट यानी समाचारपत्र-पत्रिकाएं, टेलीविजन और ऑनलाइन। इनमें ऑनलाइन मीडिया का जन्म सबसे बाद में यानी कुछ वर्ष पहले ही हुआ है। प्रिंट मीडिया सबसे पुराना है।

अब बात करते हैं खबरों की विश्वसनीयता की। दरअसल, विश्वसनीयता और जवाबदेही के मामले में प्रिंट मीडिया अब भी इन सब में सशक्त है। आप टीवी चैनल्स पर दिन भर जो खबरें देखते हैं वो अखबारों की खबरें ही होती हैं। मान लीजिए कि किसी अख़बार ने अपने स्वार्थ या किसी व्यक्ति/पार्टी विशेष या किसी व्यवस्था के विरुद्ध कोई खबर प्लांट की। खबर प्लांट करने का मतलब यह है कि उसने कोई मनगढंत खबर छापी। तब सारे चैनल्स उसी खबर को दिखाने लगेंगे। चूंकि दफ्तरों में काम अमूमन दस बजे से शुरू होता है और अधिकारी 10 बजे के बाद ही उपलब्ध होते है। यानी खबर की सत्यता की परख होते-होते दोपहर हो जाती है।

अब मीडिया के स्तर में सुधार की बात करते हैं। दरअसल, मीडिया के स्तर में सुधार की गुंजाइश अब बहुत कम ही है। नहीं के बराबर कह सकते हैं, क्योंकि मीडिया घराने पूंजीपतियों के शिकंजे में हैं। पूंजीपतियों ने अपने काले कारनामे छिपाने के लिए समाचारपत्र या न्यूज़ चैनल्स शुरू किए। फिर इसके आड़ में तमाम गोरखधंधे शुरू कर दिए। इनका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना है। इनके लिए पत्रकारिता कोई मायने नहीं रखती। इन्होंने पत्रकारिता को बाजारू बना दिया और समाचारपत्रों को उत्पाद। मीडिया घरानों के मालिकों से ज़्यादा खतरनाक संपादक हैं, जो मालिकों के हित के बारे में तो सोचते हैं ही, अपना रैकेट भी चलाते हैं। खबरों में अपने हिसाब से मिलावट करते हैं, फिर उससे अपना उल्लू सीधा करते हैं।

मान लीजिए कहीं साम्प्रदायिक हिंसा हुई तो मीडिया का काम क्या है? दोनों पक्षों के बारे में लिखना न। लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। एक पक्ष के विषय मे तो सबकुछ लिख दिया जाएगा, लेकिन दूसरे पक्ष को एक समुदाय विशेष ही लिखा जाएगा। दलील यह कि दूसरे पक्ष का नाम लिखा तो दंगा फैल जाएगा। हर मीडिया घराना का किसी न किसी राजनीतिक दल की ओर झुकाव होता है या वह किसी न किसी दल से जुड़ा होता है। ऐसे में उस दल के विषय मे ऐसी कोई भी खबर नहीं छप सकती। अलबत्ता विरोधी दल के विषय मे हर खबर छप सकती है या चैनल्स पर दिख सकती है।

चूंकि अखबार या न्यूज चैनल्स चलाने के लिए पैसे की ज़रूरत पड़ती है, जो उसे सरकार से मिलने वाले विज्ञापनों, कम्पनियों आदि के विज्ञापनों से मिलते हैं। ऐसे में मीडिया घराने उस सरकार या कम्पनी के विरुद्ध कोई खबर नहीं छापती या दिखाती है, क्योंकि उसे यह डर होता है कि उसे मिलने वाला भारीभरकम विज्ञापन बन्द हो जाएगा। ऐसा होता भी है। इसलिए आप जहां रहते हैं, वहां के समाचारपत्र में और न्यूज़ चैनल्स पर सरकार के विरुद्ध कोई खबर नहीं मिलेगी। अगर मिलेगी भी तो उसमें भी कोई न कोई कलाकारी दिखेगी। इसके अलावा भी बहुत सी बातें हैं जिन्हें बताने बैठूँ तो एक किताब लिखने जैसा होगा

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