Tuesday ,21st May 2024

क्या महिला पुलिस कर्मी ख़ुद सुरक्षित है पुलिस विभाग में ?

संविधान बनने से पहले स्त्रियों का कोई अधिकार नहीं था वो भारतीय रूड़ी वादी परम्परा का शिकार थी औऱ मनुस्मृति के अनुसार बचपन में पिता के अंडर, जवानी में पति की दासी और बुढ़ापे मे बेटे की कृपा पर निर्भर रहती थी। संविधान मे इनको बराबरी का दर्जा दिया। संपत्ति का अधिकार, नौकरी में बराबरी का अधिकार औऱ मानसिक स्वतंत्रता ये सब आज की नारी के पास है औऱ वो मर्दों से भी ऊंची उड़ान भर रही है । लेकिन सवाल ये है कि इतना सब मिलने के बाद भी घात लागये बैठे शिकारी हर तरह से शिकार कर रहे है । 
 
*बेटियों का बाप हूँ .....*
*तेरे शहर से डरता हूँ......*
*यहाँ रहने वालों के .....*
*आँखों मे नाख़ू निकल आये है .....*
 
काम समाज में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगने की बाते तो की जाती है । लेकिन चिराग तले अंधेरे वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए वह खुद ही पुरुष अधिकारियों की यौन प्रताड़ना, मानसिक हिंसा और भेदभाव की शिकार हो रही है । सबसे ज्यादा हालात ख़ुद उस विभाग के खराब है जहाँ महिलाओं पर अत्यचार,प्रताड़ना,उत्पीड़न, बलात्कार की सुनवाई कर न्याय दिलाना है । जी हाँ ये विभाग है पुलिस विभाग ?
 
एक ही पद पर काम करने वाले पुलिस व महिला कर्मचारियों के कामकाज में भेदभाव साफ देखने को मिलता है. यूं भी पुलिस विभाग में महिलाओं का मतलब बगीचे में गुलाब कहा जाता है । इसलिए अधिकतर मामलों में उनको किसी अहम पद की जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाती. लेकिन दरअसल, यह पुरुष प्रधान समाज के अहं को संतुष्ट करने का बहाना है. यह सही है कि महिलाओं के साथ भेदभाव विभाग में भर्ती के समय से ही शुरू हो जाता है. उनकी भर्ती सबसे निचले पायदान यानी कांस्टेबल के पद पर ही ज्यादा होती है. उससे ऊपर के पदों पर भर्ती के लिए होने वाली परीक्षाओं में महिला उम्मीदवारों के साथ भेदभाव की कई मिसालें सामने आ चुकी हैं. कई मामलों में बेहतर योग्यता वाली महिलाएं इन परीक्षाओं में नाकाम रहती हैं जबकि उनसे कम योग्यता व बुद्धिमता वाले पुरुष साथी इनमें कामयाब हो जाते हैं. ऊपर के पदों पर पुरुष अधिकारियों की मानसिकता भी इसके लिए जिम्मेदार है. भर्ती के बाद उनके प्रशिक्षण में भी भेदभाव होता है. पुरुष साथियों को जहां कठिन प्रशिक्षण दिया जाता है वहीं महिलाओं को हल्की-फुल्की ट्रेनिंग दी जाती है. इसके पीछे आम धारणा यह होती है कि इन महिलाओं को कौन सा मोर्चे पर जाकर हिंसक भीड़ से निपटना है ? इनका असली काम तो थाने या पुलिस मुख्यालयों में बैठ कर टाइप करना ही है ।
 
भले ही महिला पुलिस थाने खुल गए हों और पुलिस में ज्यादा तादाद में महिलाओं की भर्ती की गई हो, लेकिन विभाग के अंदरूनी हालात में कोई बदलाव नहीं आया है. अब भी ऐसी महिला पुलिसकर्मी ऊपर के पुरुष अधिकारियों की दया पर जीने को मजबूर हैं. तमाम दूसरे सरकारी विभागों की तरह पुलिस विभाग में भी यौन उत्पीड़न की विरोधी शाखा खोली गई है. लेकिन वहां शिकायत करने की स्थिति में सजा के तौर पर इन महिलाओं का तबादला दूर-दराज के इलाकों में कर दिया जाता है. अपने करियर व घर को बचाने के लिए अक्सर महिला कर्मचारी अपने पुरुष अधिकारियों की मनमानी झेलने पर मजबूर हैं औऱ शिकार हो रही है आखिर वे शिकायत करें भी तो किससे ? ऊपर आला पदों पर तो तमाम पुरुष अधिकारी बैठे हैं । ऐसे में यौन प्रताड़ना के एकाध मामले अगर सामने आते भी हैं तो उनको दबा दिया जाता है. शिकायत करने वाली महिला के जिम्मे बदनामी के सिवा कुछ हाथ नहीं आता अपनी सहकर्मी की हालत देख कर दूसरी महिलाएं डर के मारे चुप्पी साधने पर मजबूर हैं औऱ कभी आंखों से तो कभी बातों से तो कभी कभी समर्पण से शिकार हो रही है ?
 
पुरुष प्रधान समाज में हर जगह महिलाओं को हेय दृष्टि से देखा जाता है और पुलिस विभाग भी इसका अपवाद नहीं है । खुद को महिलाओं से बेहतर मानने की पुरुष मानसिकता ही इसकी जिम्मादर है. पुलिस विभाग में काम करने वाली महिलाओं के साथ अब भी पेशेवर व मानवीय व्यवहार नहीं किया जाता पुलिस में महिलाओं की दयनीय स्थिति और उनकी यौन प्रताणना जैसे ज्वंलत मुद्दों पर मेरा ये खुला लेख है लेकिन बावजूद उसके हालात जरा भी नहीं बदलने वाले ?
 
दरअसल, बदलते दौर में जब महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं, समाज के दूसरे तबकों की तरह पुलिस में भी महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार प्रासंगिक है। लेकिन इसके लिए सरकारी नीतियों के अलावा समाज की मानसिकता में भी बदलाव जरूरी है। ऐसा नहीं होने तक चिराग तले अंधेरा कायम रहेगा ।दूसरों के दुख-दर्द को दूर करने का जिम्मा उठाए यह महिला पुलिस कर्मचारी अपने खिलाफ होने वाले अत्याचारों को आखिर कब तक सहती रहेगीं ? इस लाख टके के सवाल का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है ?

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