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सुविधाओं की कमी से जूझती पुलिस की पीड़ा सुनने वाला कोई राजनितिक दाल नहीं ?

 
देश और प्रदेश में अपराध की बढ़ती खबरें अक्सर सुर्खियां बटोरती हैं. इनके लिए पुलिस को कटघरे में खड़ा किया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश और प्रदेश में पुलिस की हालत कितनी दयनीय है? सौ साल से लंबे अरसे से पुलिस सुधारों पर चलने वाली बहस भी अब तक परवान नहीं चढ़ सकी है. सुप्रीम कोर्ट के कई निर्देशों के बावजूद अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई है. सोली सोराब जी समिति ने वर्ष 2006 में पुलिस अधिनियम का एक प्रारूप तैयार किया था. लेकिन उसकी पोर्ट भी ठंडे बस्ते में है. संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशों के मुताबिक, हर साढ़े चार सौ लोगों पर एक पुलिसवाला होना चाहिए. लेकिन भारत में स्थिति एकदम उलट है. यहां राष्ट्रीय औसत 729 लोगों का है लेकिन कई राज्यों में यह आंकड़ा 11 सौ तक है. इससे तस्वीर का पता चलता है। इतना ही नहीं देश में  75 फीसदी पुलिस अधिकारियों को फैमिली क्वार्टर तक मुहैया नहीं है. देश में लगभग 23 .8 लाख पुलिस अधिकारी हैं. लेकिन उनमें से महज 5.6 लाख लोगों को ही फैमिली क्वार्टर मिला हुआ है. बाकी लोग या अपने परिवार से दूर रहते हैं या फिर किराये के मकानों में रहने को मजबूर है।
 
लेकिन आखिर ऐसी हालत क्यों है? इस मुख्य कारण ये है की संबंधित राज्य सरकारें अपने कुल बजट का महज 3.1 फीसदी ही पुलिस पर खर्च करती हैं। पुलिस बल के आधुनिकीकरण के मद में केंद्र से मिलने वाली रकम के दूसरे मद में खर्च होने की खबरें अक्सर सुर्खियां बनती हैं।  खासकर पूर्वोत्तर और झारखंड व छत्तीसगढ़ जैसे उग्रवाद और माओवाद से प्रभावित इलाकों में स्थिति चिंताजनक है। इन इलाकों में उग्रवादियों के पास जहां आधुनिकतम एके-47 और 56 के अलावा रॉकेट लॉन्चर तक मौजूद हैं वहीं पुलिस वालों को बाबा आदम के जमाने के हथियारों से उनका मुकाबला करना पड़ता है. नतीजतन उग्रवादियों या माओदियों के साथ होने वाली मुठभेड़ों में अक्सर पुलिसवाले ही ज्यादा मरते हैं।
 
आखिर पुलिस बल की इस हालत में सुधार कैसे हो सकता है ? विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारें कानून व व्यवस्था बनाए रखने के इस सबसे अहम तंत्र के प्रति उदासीन हैं। तमाम दलों के नेता अक्सर पुलिस सुधारों और पुलिस बल के आधुनिकीकरण की बातें और दावे तो करते हैं. लेकिन उनको अमली जामा पहनाने के मामले में वह गंभीर नहीं हैं।  देश में आजादी के बाद से ही पुलिस आधुनिकीकरण पर खास खर्च नहीं किया गया है. केंद्र व राज्य सरकारों को तमाम थानों में आधारभूत सुविधाएं मुहैया करने को प्राथमिकता देनी चाहिए. एक पूर्व पुलिस अधिकारी कहते हैं, की  "राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आने के बाद पुलिस बल का इस्तेमाल अपना राजनीतिक हित साधने के लिए करने लगती हैं. कोई भी पार्टी इस मामले में अलग नहीं है. इस वजह से पुलिस के आधुनिकीकरण का मुद्दा हाशिए पर चला जाता है." वह कहते हैं कि पुलिस बल के आधुनिकीकरण के मसले पर कोई भी सरकार गंभीर नहीं है. राजधानियों और बड़े शहरों में तो फिर भी स्थिति ठीक है. लेकिन ग्रामीण इलाकों में तस्वीर बेहद दयनीय है।  केंद्र को तमाम राज्य सरकारों के साथ मिल कर पुलिस बल के आधुनिकीकरण और खाली पदों पर बहाली के लिए एक ठोस रणनीति तैयार करनी होगी और समयबद्ध तरीके से उसे अमली जामा पहनाना होगा। ऐसा नहीं होने तक देश में विकास के साथ-साथ अपरधों का ग्राफ भी तेजी से बढ़ता ही रहेगा ?

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