Tuesday ,21st May 2024

मजबूरी किसी बंद दरवाजे के पीछे कपड़े उतारने को मजबूर करती है ?

 

कभी  नौकरी के झूठे वादे, तो कभी प्यार का झांसा, पति का धोखा और कई बार खुद उनकी मजबूरी किसी बंद दरवाजे के पीछे कपड़े उतारने को मजबूर करती है ?

झोला छाप ख़बरी की कलम से

(पहचान छुपाने के लिए उनका नाम बदला गया है)

उस सेक्स वर्कर की जुबानी जब मेने सुनी उसकी मज़बूरी की कहानी तब पता चला की देश में महामारी ने क्या क्या किया एक ऐसी महिला जिसने कभी सोचा भी नहीं था की उसे अपने परिवार का भरण पोषण करने इस  गंद में उतरना पड़ेगा जिसने उसकी हस्ती खेलती जिंदगी और गरीबी ने उसे वैसे ही मजबूर कर रखा था की अचानक कोरोना जैसी महामारी के चलते देश भर में लॉक डाउन लग गया जिसे उसकी ज़िंदगी भी लॉक होगयी और गरीबी वेसे ही उसके घर में टंगे पसारे थी की अचानक लगे लॉक डाउन डाउन ने और उसकी गरीबी में उसे भी जिस्मफरोशी की.. तरफ धकेल दिया और एक दिन उसने एक अपनी मज़बूरी और लाचारी के चलते इस धंधे को चुन लिया उससे जब मेने बात की तब पता चला की उसे अभी इस धंधे में एक महा हुआ है उसने बताया की  "हमें बुलाने वाले ज्यादातर लोग उम्रदराज, रिटायर्ड लोग होते हैं, लेकिन सबकी चाहत 16 साल की लड़की की होती है। यहां लड़की की उम्र, उसकी फिटनेस और रंग के हिसाब से पैसे मिलते हैं। औसतन 200 से 2000 तक रुपए एक बार के मिलते हैं।" उसने  धंधे की परते खोली  हैं।

एक स्त्री कभी नहीं चाहती की वो ये सब काम करे लेकिन मज़बूरी उन्हें इस धंधे में धकेल देती है कभी  नौकरी के झूठे वादे, तो कभी प्यार का झांसा, पति का धोखा और कई बार खुद उनकी मजबूरी किसी बंद दरवाजे के पीछे कपड़े उतारने को मजबूर करती है, जिसके बाद बाहर की दुनिया उनके लिए सिमट जाती है। जिस्मफरोशी की दुनिया रहस्यों जैसी है, ज्यादातर लोग अपने-अपने हिसाब से अंदाजा लगाते हैं। कहा जाता है जो यहां एक बार गया वो इसकी काली साया से निकल नहीं पाता। कभी नौकरी के झूठे वादे, तो कभी प्यार का झांसा, पति का धोखा और कई बार खुद उनकी मजबूरी किसी बंद दरवाजे के पीछे कपड़े उतारने को मजबूर करती है, जिसके बाद बाहर की दुनिया उनके लिए सिमट जाती है। भोपाल  में रहने वाली जेस  इनमें से एक हैं। घर वालों ने गरीबी के चलते 20  साल की उम्र में शादी कर दी थी, मजदूर पति की टांग टूटने के बाद जब पति बिस्तर पकड़ गया तब कोई सहारा नहीं बचा जैसे तैसे अपना घर बर्तन मांजकर चलती थी लेकिन लॉक डाउन में मालिक बहार चला गया जिसकारण तंगी का सामना करना पड़ा बमुश्किल जैसे तैसे अपना गुज़र बसर करने वाली एक बेटा और बेटी साथ ही लचर बिस्तर पर पड़े पति का पेट नहीं पाल पा रही थीं, मजबूरी में वो सेक्स वर्कर बन गईं।

ये जो मेरी इस खबर की सूत्रधार है उसको मेने नाम जेस दिया है जिस पिछले एक महा से इस धंधे में है वो इस काम से हाला की खुस तो नहीं है लेकिन बच्चो को अच्छी शिक्षा और अच्छी परवरिश  देना चाहतीं है। हाला की जेस का खाना है की मेने अच्छा पैसा कमलिया है।  इन दिनों अब में परेशन नहीं हूँ मेरे पतिका इलाज भी चल रहा है  बेटा और बेटी दोनों को अच्छे स्कूल में पढ़ाऊंगी  पति को मतलब नहीं, लेकिन मोहल्ले और रिश्तेदारों के लिए वो घरेलू महिला है, और कुछ पार्टटाइम काम करती हैं। वो चाहती भी नहीं दुनिया को उनके काम के बारे में पता चले। इस लिए वो एक ऑफिस में भी झाड़ू पोछे का काम हालही में करने लगी है।  और समाज में मान सम्मान से जीते हुए अपना काम उसी तरह कर रही है जिस तरह इस धंधे में आने से पहले करती थी। जब मेने उससे सवाल किया की इस तरह का पेशा और परिवार को कैसे संभालती हैं, पूछने पर जेस  का गला भर्रा आया। मायूसी के साथ वो बताती हैं, "हर वक्त डर बना रहता है, कोई देख किसी को पता चल जाए। अगर किसी को पता चला तो लोग क्या कहेंगे। बच्चों का क्या होगा। लोग क्या बोलेंगे

वैसे एक सेक्स वर्कर की कामकाजी उम्र कुछ ही वर्षों की होती है। जेस  की उम्र ज्यादा तो नहीं लेकिन उनके मुताबिक कुछ साल बाद  'बिकाऊ' नहीं रहा जायगा है। और वो ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पाएगी नहीं उनकी पहली पसंद कुछ देर चुप रहने के बाद वो कहती हैं, "हर आदमी को तो सुंदर और कम उम्र की लड़की चाहिए। फिर मनमाने पैसे नहीं मिलते, वैस भी ग्राहक हर बार नई लड़की चाहता है। हां कुछ पर्मनेंट ग्रहक है इसमें ज़्यदातर को हमसे प्यार हो  है, वो जरुर लगातार बुलाते है अब जेस की ये कहानी सुनने के बाद मेरी खबर को और रोचक और सरकार की आंख से पट्टी खोलने मेने जेस से पूछा और कितनी ऐसी महिला को जानती हो जो लॉक डाउन के बाद इस धंधे में आयी उसने मुझे दो और महिला के बारे में बताया और में उन दो से मिला उनकी सभी १० महिलाओ की मज़बूरी और लाचारी यही थी भूख मरी और बच्चो का ललन पोषण इसमें से सात महिला ऐसी थी जिनको पति ने छोड़ दिया या वो विधवा थी जिन्होंने घर वालो के खिलाफ शादी की थी उनकी ये मज़बूरी थी की वो घर वालो से अपनी स्थिति नहीं बता सकती थी इस लिए उन्होंने अपने बच्चो का और अपना पेट भरने इस रस्ते को चुना।अब अगर लॉक डाउन के बाद ऐसा असर पड़ा है की गरीब और लाचार महिलाओ को इस गद्दे धंधे में उतरना पद गया तो ललत है उन सभी संस्थाओ पर जो सरकार से गरीब और लाचार की मदद के लिए मोटी रकम लेती है और पूछता है भारत के उस सवाल का जवाब है जिन्होंने इन्हे इस धंधे में धकेल कर आत्मनिर्भर भारत बनाया। 


 

 

 

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