Friday ,24th May 2024

टूटी कमर तो कुछ बताने से रही

छत्तीसगढ़ के सुकमा में हुए नक्सली हमले के बाद 25 सीआरपीएफ जवानों में मारे जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस ट्वीट ‘शहीदों की कुर्बानी बेकार नहीं जाएगी’ को उसी भावना से लिया जाना चाहिए जिस भावना से उन्होंने कहा है. बीते दो दिनों में यह दिख भी रहा है क्योंकि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी रायपुर में उसी भावना को मजबूती प्रदान करते हुए कहा कि हम शहीदों की शहादत को बेकार नहीं जाने देंगे. मुख्यमंत्री रमन सिंह ने किसी आरपार की बात नहीं की लेकिन यह बताया कि हमारे जवान उस क्षेत्र में काम करते रहेंगे और अपने कदम पीछे नहीं खींचेंगे. खींचना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह समय तो आगे बढ़ने का है. इस बीच, पूरे देश में शहादत और बदले की भावना का इतना विस्तार हुआ है कि इसके अलावा और कुछ बचा नहीं है. इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया वाले तो जैसे सब कुछ तुरंत-तुरंत निपटा देना चाहते हैं. वो तो सरकार का भी इंतजार करना चाहते. शायद मानकर चल रहे होंगे कि उनकी जिम्मेदारी सरकार से ज्यादा है.
यह एक वारदात और देश के एक हिस्से का मामला है. ठीक इससे पहले एक अन्य सतत चलने वाली वारदात और देश के एक दूसरे हिस्से के मामले को लेकर वहां की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती राजधानी दिल्ली में थीं और प्रधानमंत्री व गृहमंत्री से मुलाकात कर रही थीं.
उनकी समस्या भी कोई कम बड़ी नहीं है. उनके राज्य में पत्थरबाजी की घटना फिर बढ़ गई है. कई महीने से स्कूल नहीं खुले थे. अब खुले तो पत्थरबाजी बढ़ गई. केंद्र और राज्य सरकार इसमें उलझी हैं कि पत्थरबाजों से किस गन से निपटा जाए. आतंकी वारदातें और मुठभेड़ की वारदातें आम होती जा रही हैं. नेताओं तक को निशाना बनाया जा रहा है. ऐसे में अब से कुछ समय पहले के हालात और उन पर की जाने वाली बयानबाजियां बरबस याद आती हैं. यह नोटबंदी के बाद समय था. जब चारों ओर लोग परेशान थे और इसे गलत फैसला बता रहे थे, तब सरकार की ओर से इसे न केवल सही फैसला बताया जा रहा था बल्कि इससे कई समस्याएं एक साथ हल हो जाने के दावे भी किए जा रहे थे.
तमाम भाजपा नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों के अतिरिक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ ने पूरे देश में और संसद के भीतर भी बहुत मजबूती से यह दावा किया था कि नोटबंदी ने नक्सलवाद और आतंकवाद की कमर तोड़कर रख दी है. अब देखिए न कोई नक्सली हमला हो रहा है और न ही आतंकवादी हमला. इनके पास पैसा बचा ही नहीं है और अब आ भी नहीं सकता. पत्थरबाजी भी रुक गई है.  देश के लोगों के साथ अच्छी बात यह है कि वे इस सरकार की ओर से कही गई हर बात को अक्षरशः मान लेते हैं. मीडिया भी मान लेता है. इससे इतर न कुछ देखना चाहता है और न दिखाना चाहता है. यह अपने आप में देश के बदलने का एक बड़ा उदाहरण माना जा सकता है. ऐसा बीते 70 सालों में तो कभी नहीं दिखा. 
वरना होता यह था कि अभी कोई नक्सली हमला, आतंकी हमला अथवा पत्थरबाजी हुई नहीं कि हायतोबा मच जाती थी. तभी तो जब कहा गया कि एक के बदले दस लाएंगे और सीना 56 इंच का है, तो लोगों ने तुरंत मान लिया. यह भी मान लिया कि नोटबंदी से नक्सलवाद और आतंकवाद की कमर टूट गई. उनकी कोई गलती भी नहीं कही जा सकती क्योंकि अब तो उन्होंने सरकार की बातों को ही अंतिम मानना स्वीकार कर लिया है. लेकिन इन्हीं करीब तीन महीनों में इन दोनों राज्यों में कितना कुछ बदल गया, एकदम देश बदलने की तरह. छत्तीसगढ़ में करीब डेढ़ महीने के भीतर दो बड़े नक्सली हो गए और सीआरपीएफ के 36 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी. बीते 11 मार्च को सुकमा में ही बड़ा नक्सली हमला हुआ था जिसमें 11 जवान मारे गए थे. अब 24 अप्रैल को हुए एक और बड़े नक्सली हमले में 25 जवान देश ने खो दिए. तब भी किसी ने नहीं बताया था कि जो कमर टूटी थी उसका क्या हुआ और न अब कोई बता रहा है.
जम्मू कश्मीर में भी जिस तरह तेजी से आतंकी वारदातें बढ़ी हैं और पत्थरबाजी में एक बार फिर नए सिरे से तेजी आई है, उससे तो राज्य की दोनों सत्ताधारी गठबंधन की पार्टियों के बीच भी एक तरह की रस्साकसी शुरू हो गई है. एक नई बात यह भी देखने को मिल रही है कि काफी संख्या में स्कूली छात्राएं तक पत्थरबाजी करने लगी हैं, जो पहले नहीं थीं. आशंकाएं तो राष्ट्रपति शासन तक की व्यक्त की जाने लगी हैं. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को अटल बिहारी वाजपेयी याद आने लगे हैं. वहां के बारे में भी अब न प्रधानमंत्री, न गृहमंत्री न मुख्यमंत्री और न भाजपा नेता यह बता रहे हैं कि उस टूटी कमर का क्या हुआ.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी कुछ नहीं बोल रहे हैं. यह अलग बात है कि जब वह अमेरिका अथवा दिल्ली जाते हैं, तो यह बताना नहीं भूलते कि रेड कॉरिडोर अब गुजरे जमाने की बात हो चुकी है. रही-सही कसर भी नोटबंदी ने पूरी कर दी थी. लेकिन दो नक्सली हमलों के बीच एक बार भी उस टूटी कमर के बारे में कुछ नहीं बताया. अब किसी को टूटी कमर से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह खुद आकर कुछ बता जाएगी.

 

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