Tuesday ,21st May 2024

बरबादी के उस रास्ते पर चलने का जोखिम प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा ने भी उठा रखा है

किसी भी देश के इतिहास में चुनौती का समय आने की कोई पहले से खबर नहीं होती. समय के बहते प्रवाह में घटनाएं हस्तक्षेप करती हैं. मनुष्य से अधिक हालात महत्वपूर्ण होते हैं. मनुष्य तो परिस्थितियां बनाता ही है. कई बार परिस्थितियां खुद को रचकर मनुष्य की परीक्षा लेती हैं. परस्पर विरोधी दावों के तहत कहा जा सकता है भारत चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है. वक्त तब भी दिक्कत का था जब आजादी की जद्दोजहद कम से कम सौ बरस चली. मौजूदा समय लड़ने नहीं निर्माण की मुश्किलों का है. देश एक राय नहीं है. आगे भी एक राय होने की संभावना नहीं है. आत्मविश्वास डगमगाता है तब लोग सपने देखने लगते हैं. भविष्यवक्ताओं और नजूमियों की शरण में जाते हैं. खुद को योग्यताओं के प्रमाणपत्र देने लगते हैं. अपनी पीठ ठोकता व्यक्ति इतिहास का विदूषक होता है. नाउम्मीद लोगों पर प्रशासन का कहर बरपाता नेता आततायी शासक होता है. खुशामदखोर दरबारीनुमा बुद्धिजीवी ढिंढोरची से ज्यादा मरतबा हासिल नहीं कर पाते. अज्ञानियों के हाथ में ज्ञान की नाव की पतवार थमा दी जाती है. तो नौका डूबी जैसा कथानक लिखा जाता है. सूदखोर और काले बाजारिए सत्ता के निर्देशक या पैरोकार हो जाएं. तो वक्त की काली स्याही केवल विनाशकथा लिखती है. यह सब कुछ या तो होना शुरू हुआ है या होने होने को है.

 

भारत जैसा महादेश अठारहवीं सदी तक गरीब नहीं था. खरोंच खरोंच कर यूरोपीय हमारा धन लूट ले गए. अब गौरव के साथ पढ़ाया जाता है. भारत संसार में सबसे ज्यादा कुपोषित, बीमार, बेकार, भिखारी, विधवाओं, वेश्याओं, एड्स और तपेदिक तथा अंधत्व से ग्रस्त और सबसे ज्यादा भ्रष्ट लोगों का देश है.
यूरोपीय तमाचा भारत के गाल पर मारा जा रहा है. उन्नीसवीं सदी के मध्य तक इंग्लैंड की हुकूमत के दीवानेखास में अंगरेज सांसद भारत के वैभव की अधिकारिक तौर पर चर्चा करते रहे हैं. दुनिया की सभ्यता के सबसे पुराने मुल्क के पिछले कुछ दशकों के रहनुमाओं के पस्तहिम्मत होने के कारण देश पर गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ेपन की लानत चस्पा कर दी गई है.

 

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के पहले से ही अर्थनीति के कारपोरेटीकरण का विनाश युग शुरू हुआ. तरक्की की झूठी पपड़ियां विकास की देह पर मुरझा रही हैं. स्मार्ट सिटी, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप, बुलेट ट्रेन, जनधन योजना जैसे सरकारी प्रयोजन हैं. वे भारतीय अर्थव्यवस्था की संस्कृतिमयता के खिलाफ होने से पूरी तौर पर खारिज कर देने लायक हैं. कुशल युवक मध्यवर्गीय करदाताओं के धन से चल रही शिक्षा संस्थाओं में पढ़कर विदेश जाने को देश के बदहाल जीवन से मुक्ति पाना समझते हैं. हर अमीर देश के बाहर इलाज कराता है. वह सार्वजनिक बैंकों के धन की डकैती कर विदेश में आसानी से पनाह लेता है. विदेशी शिक्षा, विदेशी भाषा, विदेशी अदालतें, विदेशी बैंक, विदेशी फिल्में, विदेशी शराब नई संस्कृति के बैरोमीटर हैं. हैरत है इतना बदनाम आर्थिक उदारवाद का कथित युग लाने के बावजूद मनमोहन सिंह को नया कौटिल्य बताया जाता है. बरबादी के उस रास्ते पर चलने का जोखिम प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा ने भी उठा रखा है.
भारतीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं. किसान आत्महत्या कर रहे हैं. बलात्कार की घटनाएं चटखारे लेकर मीडिया में सनसनी की तरह प्रचारित की जाती हैं. आर्थिक डकैती ही उन्नति और उद्योगधर्मिता का लक्षण हैं. पचास प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीने को मजबूर हैं.

राजनीतिक पार्टियों का वैचारिक चरित्र स्खलित हो रहा है. कांग्रेस ने गांधी को खारिज कर दिया. उनकी यादों को भी अपने अस्तित्व से निकालकर फेंक दिया. दीनदयाल उपाध्याय गांधी के समकक्ष नहीं थे. फिर भी संघर्ष के आदर्श, शुचिता, सादगी, स्वदेशी, ग्राम सुधार और स्वावलंबन जैसी उनकी नसीहतें भाजपा की वैचारिक तिजोरी में रखने लायक नहीं हैं. उनका शताब्दी वर्ष केवल गाल बजाने का प्रयोजन बनकर रह गया है. यही काम कुछ दिन बाद कांग्रेस इंदिरा गांधी की याद करते हुए करेगी. जिस नेता ने बीमा, तेल, उर्वरक, लोहा, बैंक, कोयला वगैरह का राष्ट्रीयकरण किया. शाही थैली और प्रतीक खत्म किए. उसकी याद करते कांग्रेसी कहेंगे कि हम इंदिरा जी के सपनों का भारत बनाएंगे. इसके बावजूद वे आर्थिक उदारवाद की नीतियों के सामने सिर झुकाए खड़े रहे. अमेरिका के सामने परमाणु करार को लेकर मनमोहन सिंह ने जिद नहीं की होती तो देश की राजनीति की बिसात में आज वे पिट गए मोहरे नहीं होते. वक्त ठहरता नहीं है. वह पीछे भी चलता है.
महान हिन्दू कौम को अशिक्षित, कुसंस्कृत, विघ्नसंतोषी लोगों की अगुआई मिलती जा रही है. वे दिखते तो साधु की तरह हैं. परंतु आचरण ठीक उसके उलट करते हैं. भारत ने कभी भी विदेशी बुराइयों को आत्मसात नहीं किया. अच्छाइयों से परहेज नहीं किया. आज ठीक इसके उलट हो रहा है. राजनीति विचारधाराओं के मुकाबले को कहते हैं. सत्ताधारी भाजपा की देह में आधा खून तो कांग्रेसियों का है. देश की दो बड़ी पार्टियों में विचारधारा का यदि एका हो रहा है. नई संभावनाओं की उम्मीदों की फसल नष्ट हो जाने का खतरा है. देश पीछे लौट रहा है. उसे आगे जाने का भ्रम हो रहा है. उसके विचार, खानपान, पोशाक, भाषा, पारस्परिकता वगैरह को लेकर उसे नई घुट्टी पिलाई जा रही है. खेत खलिहान के देश में शौचालयों को तरजीह दी जा रही है. नेताओं का चरित्र न्यायालय से प्रमाणित होने पर भी जनअदालत में जमानत से लेकर जीत तक का इंतजाम कर रहा है. अंगरेजी के शब्द ब्यूरोक्रेसी का हिन्दी अनुवाद नौकरशाह गलत अनुवाद है. सरकारी कर्मचारी सेवक नहीं शाह हैं. फिर भी भारतीय जनता को भ्रम है कि उसका लोकतंत्र के संचालन में कुछ तो लेना देना है. मनमोहन सिंह और मोदी कभी जीप पर बैठकर भारत के खस्ता हाल गांवों का दौरा करते नहीं दिखे. विकल्पहीन विपक्ष नीतीष कुमार को चट्टान समझकर भरोसा कर रहा है. नीतीष बर्फ की सिल्ली हैं. कब पिघलकर भाजपा के साथ चले जाएं, कहा नहीं जा सकता. सच है गालिब कर्ज की पीते हैं मय और समझते हैं कि हां रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन!

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