Tuesday ,21st May 2024

सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स वर्क को पेशा माना, कहा- छापे में सेक्स वर्कर अरेस्ट न हों।

सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स वर्क को पेशा माना, कहा- छापे में सेक्स वर्कर अरेस्ट न हों।


सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स वर्क को प्रोफेशन यानी पेशा माना है. साथ ही कहा है कि सेक्स वर्कर उतनी ही सुरक्षा और सम्मान के अधिकारी हैं, जितना देश का कोई और प्रोफेशनल होता है. कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिए हैं कि वो एडल्ट और अपनी मर्ज़ी से सेक्स वर्क करने वाली औरतों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई न करे।

सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा एक सेक्स वर्कर द्वारा दायर की गई एक याचिका के माध्यम से. सेक्स वर्कर ने याचिका कोरोना के समय हुई अपनी दिक्कतों को लेकर दायर की थी. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एल नागेश्वर राव, बीआर गवई और एएस बोपन्ना की बेंच ने ये फैसला दिया 19 मई को. बेंच ने कहा,


“सेक्स वर्कर्स को कानून से बराबर संरक्षण का अधिकार है. सभी मामलों में उम्र और कंसेंट के आधार पर क्रिमिनल लॉ लागू होना ज़रूरी है. जब ये साफ हो कि सेक्स वर्कर अडल्ट है और सहमति से पार्टिसिपेट कर रही है, तो पुलिस को दखल देने या आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए. इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि प्रोफेशन कोई भी हो, संविधान के आर्टिकल 21 के तहत भारत के हर नागरिक को एक सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है.”


इसके साथ ही बेंच ने पुलिस कार्रवाई को लेकर कुछ गाइडलाइंस भी जारी किए हैं. क्या हैं ये गाइडलाइन?


– अगर किसी ब्रोथल — यानी वो जगह जहां पर सेक्स वर्क किया जाता है — में छापा पड़ता है तो सेक्स वर्कर्स को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए. न ही उससे जुर्माना लिया जाए, न उसका शोषण किया जाए और न ही उसे यातना दी जाए. ब्रोथल चलाना गैरकानूनी है, लेकिन अपनी इच्छा से सेक्स वर्क करना गैरकानूनी नहीं है।

एक बच्चे को उसकी मां से केवल इस आधार पर अलग नहीं किया जाना चाहिए कि वो सेक्स वर्कर है. कोर्ट ने कहा कि सेक्स वर्कर्स और उनके बच्चों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है और उस अधिकार का प्रोटेक्शन ज़रूरी है।


अगर किसी ब्रोथल में या किसी सेक्स वर्कर के साथ कोई माइनर रहता है तो ये नहीं मान लेना चाहिए कि बच्चे को ट्रैफिक करके ही लाया गया है।

 अगर कोई सेक्स वर्कर किसी अपराध की शिकायत लेकर आती है तो पुलिस उसके साथ भेदभाव नहीं करेगी. खासकर तब जब उसके खिलाफ हुआ अपराध सेक्शुअल नेचर का हो. यौन उत्पीड़न से पीड़ित सेक्स वर्कर्स को हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराई जाए, इसमें मेडिको-लीगल केयर भी शामिल है. ये पाया गया है कि सेक्स वर्कर्स के प्रति पुलिस का व्यवहार अक्सर बर्बर और हिंसक होता है, पुलिस को संवेदनशील होने की ज़रूरत है।

गिरफ्तारी, छापों, रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सेक्स वर्कर की पहचान जाहिर न हो, इसका मीडिया पूरा ध्यान रखे. न विक्टिम के तौर पर और न ही आरोपी के तौर पर उनकी पहचान या फोटो प्रकाशित की जाए।

कॉन्डम के इस्तेमाल को पुलिस सेक्स वर्कर के आरोपी होने के सबूत के तौर पर इस्तेमाल न करे.


रेस्क्यू की गईं या मजिस्ट्रेट के सामने पेश की गईं सेक्स वर्कर्स को 2-3 साल से ज्यादा समय के लिए सुधार गृहों में न रखा जाए, अगर मजिस्ट्रेट ये पाते हैं कि सेक्स वर्कर की सहमति थी तो उन्हें छोड़ दिया जाए।

कोर्ट ने अपनी इन गाइडलाइन पर जवाब देने के लिए केंद्र सरकार को 27 जुलाई तक का समय दिया है।

 

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