Tuesday ,21st May 2024

मध्यप्रदेश और देश में ये केसा रामराज्य फिर ज़िंदा हुई बंधुआ मज़दूरों की लाशें

मध्यप्रदेश की स्थापना 64 वर्ष और देश की आजादी के 74  के बाद भी प्रदेश में बंधुआ मजदूरी एक कड़वा सच है

मध्यप्रदेश ने एक नवंबर २०१९ में अपना 64 वा स्थापना दिवस मनाया और आगामी एक नवम्बर को अपना 65 वा स्थापना दिवस 2020  में मानाने वाला प्रदेश होगा जहा एक तरफ देश को आज़ादी मिले 74 वर्ष हल ही में 15 अगस्त 2020 को पूर्ण हुए है ऐसे में मध्यप्रदेश के एक  बंधुआ मजदूर दंपति ने इलाज के अभाव में अपने आठ साल के बेटे को खो दिया. घटना मध्य प्रदेश के गुना की है. कड़े कानून के बावजूद प्रदेश और देश में आज भी बंधुआ मजदूरी सामान्य बात है.ये सब सरकार के बड़े बड़े दावे और खोखली योजना की पोल खोलते नज़र आते है।    

मध्य प्रदेश का  गुना जिला जो ग्वलियर  राज घराने का एक ऐसा क्षेत्र जहा से लगतार सिंधिया परिवार चुनाव लड़ता रहा है क्योकि राज परिवार से सम्बन्ध होने के नाते इस में राजे रजवाड़े जमींदार और कोठी वालो का काफी रसूक भी है जिस कारण गुना व अधिकतर चम्बल क्षेत्र में आज भी बंधुआ मज़दूरी एक अभी श्राप है। पूर्व की सरकारों ने यहाँ से बागियों का सफाया तो कर दिया लेकिन बंधू मज़दूरी पर सिर्फ चर्चा और घोसणा ही हो पायी इस का नतीजा ये हुआ की हाल ही में एक बंधुआ मजदूर दंपति के बेटे की मौत हो गयी और उसके बाद जब मामला बढ़ा तो प्रशासन से आसपास के इलाकों में ऐसे मामलों पर कार्रवाई की मांग तेज की लेकिन हफ्ते भर में ये तेजी दम  तोड़गयी। और  कर्ज लेकर बंधुआ बन जाना गुलामी का सबसे सामान्य तरीका बनता जा रहा है , हालांकि चार दशक पहले इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था. लाखों लोग बतौर बंधुआ मजदूर ईंट भट्टों, खेत, चावल मिलों में काम कर कर्ज चुकाने की कोशिश करते हैं.महंत सिंधिया परिवार के क्षेत्र में ये गुलामी कोई बड़ी बात नहीं हो सकती क्योकि राजे ,रजवाड़े, ठाकुरो और सेठ साहूकारों को बंधुआ मज़दूर बनाने का इनके क्षेत्र में अधिकार है। क्योकि क्षेत्र शायद राज परिवार के अधीन है। 

गुना के बंधुआ मज़दूर मामले में पुलिस के मुताबिक बच्चे के माता-पिता पर 25,000 रुपये का कर्ज था और वह उसे चुकाने के लिए खेत पर पिछले पांच सालों से बिना वेतन के ही काम कर रहे थे. उनके पास रहने के लिए मकान भी नहीं है और प्लास्टिक की छत के नीचे उनकी जिंदगी जैस तैसे कट रही है. पुलिस का कहना है कि जब उन्होंने अपने मालिक से बच्चे के इलाज के लिए पैसे मांगे तो उनके साथ मारपीट की गई.

गुना कैंट के एसएचओ  के मुताबिक, "बच्चे के पिता अपने नियोक्ता के खिलाफ शारीरिक हमले की शिकायत दर्ज कराने आए थे लेकिन जब हमने जांच की तो यह बंधुआ मजदूरी का मामला निकला." उन्होंने आगे कहा, "जब हम उनके गांव पहुंचे तो देखा दूसरे बच्चे भी बीमार थे और उन्हें अस्पताल पहुंचाया. परिवार की हालत भी ठीक नहीं थी. स्थानीय श्रम अधिकारियों का कहना है कि बच्चे की मौत 20 सितंबर को अस्पताल में इलाज के दौरान हो गई, दंपति के तीन और बच्चों का मलेरिया के लिए अस्पताल में इलाज चल रहा है. दिहाड़ी पर काम करने वालों पर कोरोना वायरस महामारी आफत पर बनकर टूटी है. एक तरफ तो श्रमिकों का रोजगार चला गया दूसरी तरफ उनके बचाए हुए पैसे भी  खाने पर और परिवार पर खर्च हो गए. कई श्रमिकों को कर्ज भी लेना पड़ा है. इसी कारण यह आशंका बढ़ गई है कि बंधुआ मजदूरी कहीं और ना बढ़ जाए.

2011 की जनगणना में देश में 1,35,000 बंधुआ मजदूरों की पहचान की गई थी. भारत में बंधुआ मजदूरी के खात्मे के लिए पहली बार कानून 1976 में बना था. कानून में बंधुआ मजदूरी को अपराध की श्रेणी में रखा गया था. साथ ही बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए लोगों के आवास व पुर्नवास के लिए दिशा निर्देश भी इस कानून का हिस्सा हैं. लेकिन चार दशक बाद भी बंधुआ मजदूरी से जुड़े मामले आते रहते हैं. गुना के मामले में बंधुआ मजदूरी कराने वाले व्यक्ति, उसके पिता और उसकी पत्नी को बंधुआ मजदूरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. साथ ही उनपर एससी-एसटी एक्ट के तहत भी मुकदमा दर्ज किया गया है. श्रम अधिकारियों का कहना है कि वे उस गांव में जांच चल रही हैं कि कितने और लोग बंधुआ मजदूरी के जाल में फंसे हुए हैं.लेकिन कुछ नतीजा कुछ नहीं क्योकि अधिकरियों के पास समय नहीं है.

वैसे तो सही मायने में लाचार सरकार और बिकाहुआ अधियकरी कभी भी बंधुआ मजदूरी मुक्त प्रदेश नहीं दे सकता साथ ही खात्मे के आसार  कम और वृद्धि के आसार ज्यादा है क्योकि नोट बंदी ने जहा कमर तोड़ दी थी तो वही कोरोना जैसे संक्रमण के लिए लगाए गए लॉक डाउन ने फिर गरीब को बंधुआ बनने पर मज़बूर कर दिया है और सेठ साहूकार इस का भरपूर आनंद ले रहे है क्यों की मध्यप्रदेश और देश में फिर से रामराज्य आने वाला है  ,

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