Tuesday ,21st May 2024

माँ का स्मारक तरस रहा है ,

माँ  का  स्मारक तरस रहा है ,

आज़ादी के मतवाले की माँ को भूली सरकार,..........

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हालही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने क्रांतिकारी शहीद चन्द्रशेखर तिवारी,, आजाद ,,की जन्मस्थली भाबरा में आकर 70 साल याद करो आज़ादी का आरम्भ किया भाबरा जो हमारे मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले का कस्बा है.पहले अलीराजपुर आदिवासी बहुल झाबुआ जिले का हिस्सा हुआ करता था. सबसे ज्यादा कटोचने और पीड़ा देने वाली बात यह है की आजाद की जन्मस्थली भाबरा और झाँसी की रानी तथा तात्याटोपे की शहादतस्थली ग्वालियर और शिवपुरी मध्यप्रदेश में होने के बावजूद प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान करोड़ों रुपये खर्च कर शौर्य/शहीद स्मारक नवाबों की नगरी भोपाल में बनवा रहे हैं...!  जिसका कोई ओचित्य नहीं वर्ष २०११ में एक स्टोरी के लिए चन्द्रशेखर तिवारी ( आजाद ) की जन्म स्थली जानेका पहली बार मोका लगता तब और अब में कोई फर्क नहीं आया मोदी जी की सभा के बाद मेने सोचा की इस मतवाले को जन्म देने वाली और देश पर अपने लाला को कुर्बान करने वाली वो जननी कितनी भाग्यशाली होगी .... आजाद पर तो कई लोगो ने खूब काम किया और खुब लिखा है में उस माँ के बारे में कुछ लिखना चाहता था जिसने इस मतवाले की जन्म दिया  और निकल पड़ा माँ की तलाश में ..

मोदी जी को शायद  ये नहीं मालूम की इस मतवाले को जन्म देने वाली चन्द्रशेखर आजाद की माँ नाम जगरानी देवी तिवारी , जिन्होंने अंतिम सांस झाँसी में ली थी. मोदीजी के आजाद की जन्मस्थली पहुँचने के दोरं मुझे याद आया की स्वर्गीय आजाद की माँ का देहावसान झाँसी में हुआ था. इस बारेमें  और अधिक ब्योरे के लिए में झाँसी के लिए रवाना हुआ और इस वारे में अधिक जानकारी जुटाने में लग गया की तभी मुझे पता चला की स्वर्गीय आजाद ने फरारी के छह बरस मध्यप्रदेश में गुजारे थे. इस दौरान वे ओरछा के अलावा दतिया और पन्ना आदि में भी रहे. ओरछा में सातार नदी के किनारे गुफा के समीप कुटिया बना कर वे डेढ़ साल रहे थे.

मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने वहां इंदिरा गाँधी के कर कमलों से उनकी मूर्ति स्थापित करवाई थी . वहां एक भवन भी बना है जहाँ कहते हैं की हमेशा ताला जड़ा रहता है. झाँसी के मास्टर रूद्र नारायण आजाद के गुरु थे. आजाद का एकमात्र उपलब्ध दुर्लभ फोटो रुद्रनारायण की पत्नी और दो बेटियों के साथ का ही है. आजाद के शहीद होने के बरसों बाद तक उनकी माँ को इसकी जानकारी नहीं थी और वे भाबरा में ही रहा करती थीं. आजादी के बाद आजाद की माँ की जब किसी ने भी सुध नहीं ली तब बनारसीदास चतुर्वेदी की पहल पर भगवानदास माहौर और सदाशिवराव मलकापुरकर माँ जगरानी देवी को झाँसी ले आए. इन महानुभावों ने उन्हें तीर्थ यात्रा भी करवाई. उन्होंने झाँसी में माहौर जी की देखरेख में २१ मार्च,१९५१ को प्राण त्यागे और बड़ागाँव गेट के पास के शमशान घाट पर इस माँ का अंतिम संस्कार कर दिया गया. दुर्भाग्य से आजाद जैसे आजादी के मतवाले को जन्म देने वाली इस राष्ट्रमाता का स्मारक झाँसी में आकार नहीं ले पाया है. और इस मतवाले को अपने खून से सिचने वाली माँ का स्मारक आज भी आकर के लिए किसी नेता या रहम दिल इन्सान की बाट जोत रहा है ....

तो वाही मध्य प्रदेश के मुखिया और देश के हरदिल अज़ीज़ प्रधानमंत्री भावरा में उस मतवाले को याद कर रहे है ... किसान भी खेत में बिज़ डालने से पहले धरती माँ को नमन करता है .... क्योंकि माँ की जगह सबसे ऊपर है , अगर मोदी जी को 70 साल याद करो आज़ादी का आरम्भ करना ही था तो उस माँ को पहले याद करना था जिसने इस मतवाले को देश पर कुर्बान होने जन्म दिया ....

राजेंद्र सिंह जादौन 

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